समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनंत जन्मों की कमाई का उच्च उपादान लेकर आता है, मोक्ष के लिए, और विषय के पीछे उसे क्षणभर में ही खो देता है!! अरे! हे मानव! तेरी समझ कैसे आवृत हो गई?!
मनुष्य निरालंब नहीं रह सकता। निरालंब तो सिर्फ ज्ञानीपुरुष ही रह सकते हैं! उनके अलावा बाकी लोग बुद्धि के आशय में स्त्री, पुत्रादि के टेन्डर भरकर ही लाते हैं, जिससे उनके बिना उन्हें नहीं चलता। माँगी थी सिर्फ स्त्री, लेकिन साथ-साथ आ गए सास, ससुर, साला, साली, ममेरे ससुर, चचेरे ससुर। बड़ा लंगर लग गया! 'अरे, मैंने तो एक स्त्री ही माँगी थी और यह लशकर कहाँ से आ गया?!' 'अरे, स्त्री कहीं ऊपर से टपककर आती है। वह आएगी तो साथ-साथ यह लशकर आएगा ही न! तुझे क्या पता नहीं था?' इसी को कहते हैं अभानता! परिणाम का विचार ही नहीं आता कि एक विषय के पीछे कितने लंबे लशकर की लाइन लग जाती है!! अरे, घानी के बैल की तरह पूरी जिंदगी बीत जाती है उसके पीछे!
किसी ने सही बात सिखाई ही नहीं। बचपन से ही माँ-बाप या बुजुर्ग दिमाग में डालते रहते हैं कि बहू तो ऐसी लाएँगे और शादी किए बिना तो चलेगा ही नहीं और वंश तो चलता ही रहना चाहिए।
आत्मसुख खचने के बाद विषयसुख फीके लगते हैं, जलेबी खाने के बाद चाय कैसी लगती है? जीभ का विषय 'ओ के' कर सकते हैं, लेकिन बाकी सब में तो कुछ बरकत है ही नहीं। मात्र कल्पनाएँ ही हैं सारी! घृणा उपजाए, ऐसी चीज़ है विषय!
पाँचों इन्द्रिय में से किसी को भी विषय भोगना अच्छा नहीं लगता। आँखों को देखना अच्छा नहीं लगता, इसलिए अंधेरा कर देते हैं। नाक को भी बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। जीभ की तो बात ही क्या करनी? बल्कि उल्टी हो जाए, ऐसा होता है। स्पर्श करना भी अच्छा नहीं लगता, फिर भी स्पर्श सुख मानते हैं! किसी को भी अच्छा नहीं लगता फिर भी किस आधार पर विषय भोगते हैं, वही आश्चर्य है न? लोकसंज्ञा से ही इसमें पड़े हैं!
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