भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

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दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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प्रश्नकर्ता : अब मुझे ऐसा लग रहा है कि शक्ति तो है ही।

दादाश्री : और सारी शक्ति होती तो है, लेकिन वह उत्पन्न नहीं हुई है न?!

प्रश्नकर्ता : तो वह शक्ति उत्पन्न कैसे होगी?

दादाश्री : वह तो रात-दिन उसी के विचार हों, उसी पर विचारणा करता रहे और उसमें कितना आराधन करने योग्य है और वह कितना करने योग्य है, तुरंत अंदर जैसे-जैसे हमें विचारणा हो न, वैसे-वैसे खुलता जाएगा।

प्रश्नकर्ता : यानी इसका मीनिंग यही हुआ न कि कुछ भी करके यह व्यवहार खत्म कर देना चाहिए।

दादाश्री : इसलिए वे श्री विज्ञान इस्तेमाल करते हैं न? और सोचा हुआ होगा तो श्री विज्ञान भी इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता : दिन भर के जो व्यवहार हैं, वे व्यवहार आवश्यक हैं। वही उसकी प्रगति में अंतरायरूप हैं न अभी, क्योंकि उसे सोचने का टाइम ही नहीं मिलता।

दादाश्री : इसलिए इसके बजाय, सबसे अच्छा यह है, कि अपनी दृष्टि कहीं पर भी चिपके, तो उखाड़ देना और प्रतिक्रमण कर लेना, बस।

प्रश्नकर्ता : उसके बाद मन कब तक इस एक ही सिद्धांत पर चलेगा? मन एक सिद्धांत पर कन्टिन्युअस नहीं चलता। बार-बार दृष्टि बिगड़ती है और प्रतिक्रमण करना या यह करना, यह सिद्धांत कन्टिन्युअस नहीं चलता। श्री विज्ञान भी एट-ए-टाइम नहीं चलता। कन्टिन्युअस रहना चाहिए और जब विस्तार से उसे समाधान हो, तब वह आगे बढ़ता है।

दादाश्री : वह विस्तार से सप्लाइ भी करना पड़ता है। अपने