समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दुःख देखने को मिलता है न? घर और बाहर, सभी ओर देखने को मिलता है। खुला ही है न!
दादाश्री : अरे, इन प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले दुःखों को छोड़ो न। उन दुःखों को देख लेंगे थोड़ा बहुत। दादा के कहे अनुसार करेंगे तो, ठीक हो जाएगा। अपने महात्माओं को तो पच जाएगा। लेकिन एक वह (ब्रह्मचर्य की) किताब रखनी पड़ेगी साथ में। तू नहीं रखता?
प्रश्नकर्ता : रखता हूँ।
दादाश्री : पढ़ता है न फिर। थोड़ा-थोड़ा पढ़ना पड़ेगा। उसे पढ़ने से, मन जो बहुत उछल-कूद कर रहा था, वह शांत हो जाएगा। तेरा तो बिल्कुल ठीक रहता है न?
प्रश्नकर्ता : ठीक है। वह किताब हेल्प करती है थोड़ी-बहुत, लेकिन यह विज्ञान तो बिल्कुल जुदा ही रखता है।
दादाश्री : इस विज्ञान की तो बात ही अलग है। इस विज्ञान की तो बात ही क्या!
प्रश्नकर्ता : इस किताब की हेल्प लेते हैं न, लेकिन विज्ञान पर अधिक जोर देते हैं हम।
दादाश्री : विज्ञान तो बहुत काम करता है।
प्रश्नकर्ता : फिर भले ही कैसे भी संयोग आएँ वे इस किताब में नहीं है।
दादाश्री : तेरी गाड़ी राह पर आ गई है, अब। पहले तो मुझे लगता था, कि यह स्त्री बन जाएगा। लेकिन फिर बहुत टोका। नहीं तो क्या करें? मैंने कहा, 'अगले जन्म में स्त्री के कपड़े पहनने पड़ेंगे, साड़ी-ब्लाउज।' और क्या कहूँ? अब सब निकल गया। चेहरे पर देख लेते हैं न हम! उसके विचार वगैरह सब