भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

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करके कहते हैं कि इसमें 'मन का चलता' छोड़ दो चुपचाप, अपने स्वतंत्र निश्चय से जीओ। मन की जरूरत हो तो लेना और जरूरत नहीं हो तो छोड़ दो। एक ओर रख दो उसे। लेकिन यह मन तो पंद्रह-पंद्रह दिनों तक घुमाकर फिर शादी करवा देता है। बड़े-बड़े संत भी घबरा चुके हैं, तो तुम लोगों की क्या बिसात?

ध्येय का ही निश्चय

ब्रह्मचारी बनने का यह निश्चय तो तेरा है! लेकिन यह तो तू मन के कहे अनुसार तो सबकुछ कर रहा है तो फिर यह सब तेरा है ही कहाँ? वह तो तेरे 'मन' ने कहा था, उस हिसाब से शादी करने में मजा नहीं है। तो ऐसा सब तेरे 'मन' ने तुझे कहा था और तूने एक्सेप्ट कर लिया?

प्रश्नकर्ता : अब निश्चय हो गया है न लेकिन?

दादाश्री : अब निश्चय तेरा है। यदि उसे तू तय करे कि अब यह है मेरा निश्चय। बाद में मन से कह देना कि, 'अब अगर तू उल्टा करेगा, तो तेरी बात तू जाने!' अब तो इसे अपने सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते हैं, तो अपना ही कहलाएगा, वह निश्चय।

प्रश्नकर्ता : सिद्धांत के रूप में स्वीकार करने के बाद 'अपना', वना 'मन' का?

दादाश्री : तो और किसका? उसी का है। 'अपना' कहाँ है यहाँ इस जायदाद में? जो अपनी जायदाद थी, उसे दबोच लिया है, और उसमें भी अपने किराए के मकान में रहता है। उसमें भी वह चोरी करता है न ऊपर से?

किसी के छत पर से खपरेल का टुकड़ा गिरे और लग जाए, फिर भी कुछ नहीं बोलते हो। क्योंकि वहाँ मन कहेगा कि 'कैसे कई अब?' वह तो जैसा उसका मन सिखाता है, उसी