समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
प्रश्नकर्ता : कपड़ा धुल चुका है, ऐसा किसे कहेंगे?
दादाश्री : हमें खुद को ही पता चल जाएगा कि मैंने धो दिया। प्रतिक्रमण करते हैं, उस पर से।
प्रश्नकर्ता : क्या अंदर खेद रहना चाहिए?
दादाश्री : खेद तो रहना ही चाहिए न? खेद तो, जब तक इसका निबेड़ा नहीं आ जाए, तब तक खेद तो रहना ही चाहिए। हमें तो देखते रहना है। खेद रखता है या नहीं, ऐसा हमें अपना काम करना है, वह अपना काम करेगा।
प्रश्नकर्ता : यह सब बहुत गाढ़ है। उसमें कुछ-कुछ फर्क पड़ता जा रहा है।
दादाश्री : जैसा दोष भरा है वैसा निकलेगा। लेकिन वह बारह साल में या दस साल-पाँच साल में सब खाली हो जाएगा। सभी टंकियाँ साफ कर देगा। फिर शुद्ध! फिर मजे करना!
प्रश्नकर्ता : अगर एक बार बीज डल चुका हो तो वह रूपक में तो आएगा ही न?
दादाश्री : बीज डल ही जाता है न! वह रूपक में आएगा, लेकिन जब तक वह जम नहीं गया है, तब तक कम-ज्यादा हो सकता है। मतलब मरने से पहले वह साफ हो सकता है।
इसलिए हम विषय के दोषवाले से कहते हैं न कि विषय के दोष हुए हों, अन्य दोष हुए हों, तो उसे कहते हैं कि, 'रविवार को तू उपवास करना और पूरे दिन वही सोचकर, सोच-सोच करके उसे धोते रहना। आज्ञापूर्वक इस तरह करे न तो कम हो जाएगा!
विषय से संबंधित सामाजिक-प्रतिक्रमण...
प्रश्नकर्ता : विषय-विकार से संबंधित सामाजिक-प्रतिक्रमण किस तरह करने हैं?