भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : मैंने आप सब को जो आत्मा दिया है, उसमें जरा सी भी सुखबुद्धि नहीं है। यह सुख उसने कभी चखा ही नहीं है। वह जो सुखबुद्धि है, वह तो अहंकार को है।

सुखबुद्धि रहे, उसमें कोई हर्ज नहीं है। सुखबुद्धि आत्मा की चीज नहीं है, वह पुद्गल की चीज है। तुम्हें कोई भी चीज दी जाए, तब उसमें आपको सुखबुद्धि उत्पन्न होती है। फिर से वही चीज और अधिक दी जाए, तब उसमें दुःखबुद्धि भी उत्पन्न हो सकती है। ऐसा आपको पता चलता है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : हाँ, ऊब जाते हैं फिर।

दादाश्री : अतः वह पुद्गल है। पूरण-गलनवाली चीज है। यानी वह चीज हमेशा के लिए नहीं है, टेम्परेरी एडजस्टमेंट है। सुखबुद्धि अर्थात् यह आम अच्छा हो और उसे फिर से माँगें, तो उससे ऐसा नहीं माना जा सकता कि उसमें सुखबुद्धि है। वह तो देह का आकर्षण है।

प्रश्नकर्ता : देह का और जीभ का आकर्षण बहुत रहा करता है।

दादाश्री : वह जो आकर्षण रहा करता है, उसमें सिर्फ जागृति रखनी है। हमने आपको जो वाक्य दिया है न कि 'मन-वचन-काया की तमाम संगी क्रियाओं से मैं बिल्कुल असंग ही हूँ।' वह जागृति रहनी चाहिए, और वास्तव में एकजेक्टली ऐसा ही है। वह सब पूरण-गलन है। आप अगर यह जागृति रखोगे तो आपको कर्म बंधन नहीं होगा।

प्रश्नकर्ता : अगर वही नहीं रह सके तो वह हमारे चारित्र का दोष है ऐसा मानें?

दादाश्री : वैसा क्रमिक मार्ग में होता है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन उस चारित्रमोह के कारण ढीलापन रहता है?