भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

२१०

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

वे परमाणु ही खुद विकर्षण करवाते हैं, अलग करवा देते हैं।

प्रश्नकर्ता : विकर्षण होता है तब खुद परमाणु ही अलग करवा देते हैं।

दादाश्री : हाँ, खुद ही विकर्षण करवा देते हैं, उसे अमल देकर।

प्रश्नकर्ता : मतलब वह कैसे?

दादाश्री : उसका अमल फल देकर और खुद ही विकर्षण रूपी बन जाता है।

प्रश्नकर्ता : अर्थात यह उसका नियम ही है कि यदि आकर्षण हुआ तो फिर उसका ऐसा विकर्षण परिणाम आएगा ही।

दादाश्री : आकर्षण-विकर्षण, यह नियम ही है। आकर्षण कब तक कहलाएगा? विकर्षण जब तक इकट्ठा नहीं होता, तब तक फल नहीं देता है। विकर्षण का संयोग इकट्ठा हुआ कि फल देना शुरू कर देगा।

प्रश्नकर्ता : आकर्षण फल देना शुरू कर दे तो, उसके बाद क्या होता है?

दादाश्री : फिर खत्म हो गया! इंसान मर ही गया। आप ब्रह्मचर्य के निश्चयवालों को कोई परेशानी नहीं है।

एक बार भोगा कि गया

यह विषय ऐसी चीज़ है कि जिस तरह मन और चित्त जा रहे हों, उन्हें उस तरह नहीं रहने देता। और एक बार इसमें पड़ा कि इसी में आनंद मानकर चित्त का वहाँ जाना बढ़ जाता है। 'बहुत अच्छा है, बहुत मजेदार है' ऐसा मानकर निरे अनगिनत बीज डल जाते हैं।