समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
है। कई लोग एकदम सतर्क रहते हैं। जिसे सतर्क रहना है, उसे। बर्ना ढीला पड़ जाता है।
नज़र सख्त कर दें न तो फ़ाइल बनेगी ही नहीं। उसे बुग लगे ऐसा व्यवहार करेंगे तो फ़ाइल नहीं बनेगी। मीठा व्यवहार करोगे तो चिपकेगी और खरगब व्यवहार किया तो वह गुनाह दूसरे दिन माफ़ हो सकता है। हमें इस तरह बात करनी चाहिए कि वह हम से चिपके नहीं। वह गुनाह माफ़ होने का रास्ता है लेकिन यह चिपका, उसका गुनाह माफ़ होने का रास्ता नहीं है। उसी से यह संसार खड़ा है सारा।
प्रश्नकर्ता : फ़ाइल हो, उस पर हमें तिरस्कार नहीं हो रहा हो तो क्या जान-बूझकर तिरस्कार खड़ा करना चाहिए?
दादाश्री : हाँ। तिरस्कार क्यों नहीं होता? जो अपना इतना अहित कर रही है, उस पर तिरस्कार नहीं होता? मतलब अभी पोल है! चोर नीयत है! अपना अहित करे, अपना घर जला दिया हो फिर भी क्या हमें उसके प्रति तिरस्कार नहीं होना चाहिए? यह तो भीतर चोर नीयत है, ऐसा हम समझ जाते हैं।
प्रश्नकर्ता : भीतर तिरस्कार होता है, लेकिन बाद में बुद्धि पलट देती है।
दादाश्री : पलट देती है, उसका कारण यह है कि चोर नीयत है।
प्रश्नकर्ता : बहुत परिचय हो चुका हो तो उसका अपरिचय कैसे करें? तिरस्कार करके?
दादाश्री : 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करके कई प्रतिक्रमण करना। 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करके फिर सब निकाल देना, फिर आमने-सामने मिल जाए तो उस समय सुना देना चाहिए, 'क्या मुँह लेकर घूम रही है, जानवर जैसी, यूज़लेस।' बाद में फिर वह मुँह नहीं दिखाएगी।