भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

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विषयी आचरण? तो डिसमिस (खं-2-१०)

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आते ही। जिस तरह अपने खेत-बगीचे में कोई फालतू चीज़ उग जाए तो उसे निकाल देते हैं, उसी तरह उल्टी चीज़ को तुरंत उखाड़ देना चाहिए।

पाशवता करने से तो अच्छा शादी कर लेना। शादी करने में क्या हर्ज है? वह पाशवता अच्छी है, शादीवाली! शादी नहीं करना और गलत नखरे करना, वह तो भयंकर पाशवता कहलाती है, नर्कगति के अधिकारी! और वह तो यहाँ होना ही नहीं चाहिए न? शादी करना तो हक का विषय कहलाता है। सोचकर देखना, शादी करनी है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : सवाल ही नहीं। नो चान्स।

दादाश्री : अभी जब तक पक्का नहीं हो जाता, तब तक डिसीजन नहीं लेना ही ठीक है, धीरे धीरे पक्का करने के बाद ही डिसीजन लेना।

फिसलना सहज, यदि एक बार फिसला

ब्रह्मचर्य भंग करना, वह बहुत बड़ा दोष है। ब्रह्मचर्य भंग हो जाए, तो मुश्किल है। थे वहाँ से गिर पड़े। दस साल से रोपा हुआ पेड़ हो और गिर जाए तो फिर आज ही रोपा हो, ऐसा ही हो गया न और वापस दसों साल व्यर्थ गए! और ब्रह्मचर्यवाला गिर गया। एक ही दिन गिर जाए तो खत्म हो गया।

और जो इंसान यहाँ से फिसला तो फिर वह जो फिसला, वह उतना हिस्सा फिर से जोर लगाएगा, वही हिस्सा फिर से उसे फिसलाएगा। फिर खुद के क्राबू में नहीं रह पाता। फिर क्राबू-कंट्रोल खो देता है, खत्म हो जाता है। वहाँ हम सावधान रहने को कहते हैं। ‘मर जाएगा,’ कहते हैं।

न हो संग संयोगी

जागृति रहती है न, अब? आनंद शुरू हो गया है न! वे

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