समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषयी आचरण? तो डिस्पिस (खं-2-१०)
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अभी तो, जितना खरा तप करोगे, उतना ही आनंद। यही तप करना है, और कोई तप नहीं। आमने-सामने छोटा हुल्लड हो जाए और खबर कर दें तो तुरंत प्रबंध हो जाता है। इस तरह से प्रबंध रखना है।
प्रश्नकर्ता : अब अंदर यों ब्रह्मचर्य का पक्का निश्चय हो ही गया है!
दादाश्री : तेरा निश्चय हो ही गया है। चेहरे पर नूर आ गया है न!
प्रश्नकर्ता : ज्ञान में थोड़ी कमी रह जाए तो हर्ज नहीं है, लेकिन ब्रह्मचर्य का तो बिल्कुल परफेक्ट (निश्चित) कर लेना है। यानी कम्लीट (संपूर्ण) निर्मूल ही कर देना है। फिर अगले जन्म का जोखिम नहीं रहेगा।
दादाश्री : बस, बस।
प्रश्नकर्ता : अभी तो दादा मिले हैं तो पूरा कर ही देना है।
दादाश्री : पूरा कर ही देना है। वह निश्चय डगमगाए नहीं, इतना रखना है। विषय का संयोग नहीं होना चाहिए। तुम से और कुछ भी होगा तो लेट गो करेंगे (चला लेंगे)। उसका इलाज बता देंगे। बाकी सभी गलतियाँ पाँच-सात-दस तरह की होंगी तो उसका सभी तरह का इलाज बता देंगे। उसका इलाज है, मेरे पास सभी प्रकार का इलाज है। लेकिन इसका इलाज नहीं है। नौ हजार मील आया और वहाँ पर नहीं मिला तो वापस लौट गया। अब नौ हजार पाँचसौ मील पर 'वह' था! यों वापस लौटने की मेहनत की, उससे अच्छा आगे बढ़ न! देखो न इसे निश्चय नहीं हुआ है, कितनी परेशानी है?
प्रश्नकर्ता : निश्चय तो है लेकिन गलतियाँ हो जाती हैं।