भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना है, उसे माल-मलीदा नहीं खाना चाहिए। अगर खाना ही हो तो थोड़ा खाना कि भूख ही उसे खा जाए। माल-मलीदा खाते हैं तो वापस साथ में दाल-चावल चाहिए, सब्जी चाहिए तब फिर भूख उसे नहीं खाती। खराब विकारों के आने का कारण यही है। उससे विकारी भाव उत्पन्न होते हैं। भूख खा जाए, तब तक विकारी भाव उत्पन्न नहीं होते। भूख न खाए, तब प्रमाद होता है। प्रमाद होता है इसलिए विकार होता है। प्रमाद यानी आलस नहीं, लेकिन विकार!

पुद्गल ऐसी चीज है जो परेशान करती है, वह अपना पड़ोसी है। पुद्गल अगर वीर्यवान हो, तब परेशान नहीं करता या फिर अगर बिल्कुल ही कम आहार लें, जीने लायक ही आहार लें, तब पुद्गल परेशान नहीं करता। आहार की वजह से तो ब्रह्मचर्य अटका हुआ है। आहार के बारे में जागृत रहना चाहिए। दिया जलता रहे, उतना ही खाना चाहिए। भोजन तो ऐसा लेना चाहिए कि नशा न चढ़े और नींद ऐसी होनी चाहिए कि भीड़ में बैठे हों और इधर नहीं खिसक सकें, उधर नहीं खिसक सकें, ऐसी भीड़ में बैठे-बैठे भी नींद आ जाए। वास्तव में नींद वही है। यह तो भोजन का नशा चढ़ता है, उससे फिर नींद आती है। खाना खाने के बाद विधि करके देखना, सामायिक करके देखना। होती है? ठीक से नहीं हो पाती।

नहाना भी है, निर्मंत्रण नुकसान को

नहाने से सभी विषय जागृत हो जाते हैं। ये नहाना-धोना किसके लिए है? विषयी लोगों के लिए ही नहाने की जरूरत है, बाकी तो जरा कपड़ा गीला करके यों पोंछ लेना चाहिए। जो अन्य आहार नहीं खाते, उसके शरीर से बिल्कुल दुर्गंध नहीं आती।

महीने से सिकनेस हो तो फिर विकार रहता है?

प्रश्नकर्ता : तो नहीं रहता।