भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

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न हो असार, पुद्गलसार (खं-2-१३)

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प्रश्नकर्ता : कई बार अकेले होते हैं, फिर भी अपने आप अंदर से विचार फूटने लगते हैं।

दादाश्री : अकेले जैसा कुछ होता ही नहीं है, लेकिन जब टाइमिंग होता है, तब टाइम दिखा ही देता है।

ये सब सूक्ष्म बातें हैं, कुछ-कुछ विचारशील लोगों को ही समझ में आती हैं। अगर नहीं समझेगा तो मार खाएगा। कुदरत के घर क्या कुछ कम परेशानी हैं?!

प्रश्नकर्ता : मान लो कि उसकी वह विचारधारा पाँच-दस मिनट चली तो? और फिर तुरंत ही उसका प्रतिक्रमण कर ले तो?

दादाश्री : उसमें हर्ज नहीं है। लेकिन विचारधारा के कुछ समय के अंतराल में ही कर लेना चाहिए। एकदम टाइम भी नहीं जाने देना चाहिए, वना फिर मंथन हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : यानी एक विचार आया कि तुरंत?

दादाश्री : तुरंत ही, यानी कि वह आगे और प्रतिक्रमण उसके पीछे, ऐसा। जैसे आगेवाले एक इंसान के पीछे दूसरा इंसान जा रहा हो, वैसा। तो आगे यह विचार हो और पीछे यह प्रतिक्रमण होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : यानी एक सेकन्ड की भी देर नहीं लगनी चाहिए?

दादाश्री : सेकन्ड की देर लगी हो तो चल सकता है। क्योंकि इस प्रतिक्रमण में बहुत ताकत है। इसलिए वह विचार शुरू होते ही उसे तेजी से उड़ा देना। प्रतिक्रमण में तो बहुत जोर होता है। प्रतिक्रमण का जोर अतिक्रमण के जोर से बहुत ज्यादा होता है।

जहर पी लिया हो तो अगर घूंट उसके गले से नीचे उतरने