समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक (खंड-2-१७)
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अब तो उधार चुका दो
जिसे जो कुछ भी चाहिए तो उसे हमारे वचनबल से प्राप्त हो सकता है। अभी तक हुए तमाम दोष में धुलवा देता हूँ। अब उधार चुका देते हों तो अच्छा है या नहीं? फिर नये सिरे से उधार नहीं चढ़ाना, लेकिन अब तक का उधार चुका दिया तो फिर झंझट खत्म हो गया न? नहीं तो एक बार उधार लिया कि फिर वह और भी ज्यादा कर्ज में उतरता जाता है। क्या कहता है कि 'होगा, इतने कंगाल हुए तो इतना और सही!' फिर अंततः क्या आता है? दुकान नीलाम हो जाती है।
वास्तव में तो यह विज्ञान ऐसा है कि 'आप ऐसा करो या वैसा करो' ऐसा कुछ नहीं बोल सकते, लेकिन यह तो काल ही ऐसा है! इसलिए हमें यह कहना पड़ता है। इन जीवों के ठिकाने नहीं हैं न? यह ज्ञान लेकर बल्कि उल्टे रास्ते चल सकता है इसलिए हमें कहना पड़ता है और हमारा वचनबल है तो फिर हर्ज नहीं। हमारे वचन से करे तो उसे कर्तापद की जोखिमदारी नहीं रहेगी न! हम कहें कि 'आप ऐसा करो।' तो आपकी जोखिमदारी नहीं, और मेरी जोखिमदारी इसमें रहती नहीं!
वह पाए परमात्म पद
प्रश्नकर्ता : जब कसौटी हो, तब जो संयम का पालन करे, उसे संयम कहते हैं। जब विषय के वातावरण में आए और उसमें से निकल गया तो कह सकते हैं कि इसे संयम है।
दादाश्री : लेकिन विषय तरफ के विचार कभी भी नहीं आते हों तो उसकी तो बात ही अलग है न! क्योंकि पिछले जन्म में भावना की हो तो विचार नहीं आते। हमें बाईस-बाईस साल से विषय का विचार ही नहीं आया, ज्ञान होने से पहले के दो सालों में तो विषय का विचार तक नहीं आया था। हमसे विषय-विकारी संबंध नहीं हुए थे। विकारी संबंध में हमें मिथ्याभिमान