समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
पृष्ठ 472, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंदादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)
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दादाश्री : जैसा खुद हो जाए, निश्चय भी वैसा ही हो जाता है। खुद कमजोर हो जाए, तो हो गया अनिश्चय।
प्रश्नकर्ता : लेकिन इस तरफ का निश्चय करने में इतनी देर लगती है जबकि शादी का निश्चय तुरंत ही हो जाता है। ऐसा क्यों?
दादाश्री : नहीं, यहाँ पर देर लगती ही नहीं। यहाँ पर, वह बिना देरीवाला ही है।
प्रश्नकर्ता : यहाँ पर भी बिना देरी का ही?
दादाश्री : हाँ, जैसा वह तुरंत, वैसा ही यह भी तुरंत। यहाँ पर अगर देर लगाकर किया हो तो उसका निश्चय बदलेगा ही नहीं न! कभी भी नहीं बदलेगा, मार डाले फिर भी नहीं बदलेगा।
प्रश्नकर्ता : हम सभी को अगर ठीक से समझकर यह निश्चय स्ट्रॉंग करना हो, तो समझ तो हम पूरी-पूरी लाए ही नहीं हैं न! तो फिर वह स्ट्रॉंगनेस कैसे आएगी?
दादाश्री : तेरा ध्येय होगा तो सबकुछ आएगा।
प्रश्नकर्ता : यानी जिसे स्ट्रॉंग करना है, उसका होगा ही?
दादाश्री : नहीं। ध्येय तय किया होगा न तो स्ट्रॉंग रहेगा तो फिर हो जाएगा। यह ध्येय नहीं है, उसका ध्येय नहीं है कुछ भी।
प्रश्नकर्ता : आपने दादा एक बार कहा था कि निश्चय मजबूत करना हो तो निश्चय के विरुद्ध का एक भी विचार नहीं आना चाहिए।
दादाश्री : हाँ। और अगर उस ध्येय को नुकसान पहुँचनेवाला कुछ भी आए तो उसे हटा देना चाहिए।