भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

१५

होटलें! विषय के बारे में गहराई से सोचने पर यही लगता है कि यह गटर तो खोलने जैसा है ही नहीं। कितना बंधन! यह जगत् इसीलिए खड़ा है न!

बुद्धि से सोचा है विषय के बारे में कभी?

विषय तो ऐसी चीज है जिसे मूर्ख भी न चाहे। बुद्धि का संपूर्ण प्रकाश हो चुका हो, बुद्धि का विकास हो चुका हो, वह भी विषय से डरता है बेचारा। क्योंकि विषय, वह तो बिल्कुल मूर्खतापूर्ण चीज है। इस काल में, यह तो जलन की वजह से विषय के कीचड़ में गिरता है। नहीं तो कोई कीचड़ में गिरेगा ही नहीं न! बहुत जलन होने लगे, तब ईंसान क्या करे? इसलिए उल्टा उपाय करता है। विषय के बारे में यदि सोचा जाए तो विचारक ईंसान को वह अच्छा ही नहीं लगेगा। यानी कि बुद्धि से भी विषय छूट सकता है। उसमें फिर ज्ञान का और इसका क्या लेना-देना? विषय के बारे में यदि सोचा होता न, तो उसे विषय बिल्कुल अच्छा ही नहीं लगता। निर्मल बुद्धिवाले को विषय का पृथ्यकरण करने को कहें तो, 'विषय थूकने जैसी चीज भी नहीं है।' ऐसे कहेगा। अतः जिसकी बुद्धि निर्मल हो, उसे तो विषय अच्छा ही नहीं लगेगा। वह छूएगा ही नहीं न! लेकिन जिसकी बुद्धि में मल जम गया हो, उसे तो सबकुछ उल्टा ही दिखेगा।

प्रश्नकर्ता : इस मनुष्य जाति में ब्रह्मचर्य रह ही नहीं सकता, इसका क्या कारण है? मोह है? राग है?

दादाश्री : बुद्धिपूर्वक का सुख नहीं है यह। बिना सोचे-समझे माना गया सुख है। लोगों ने जो माना, वही हमने मान लिया। वह सिर्फ मान्यता का ही सुख है और जलेबी सुखदायी है, वह बुद्धिपूर्वक का सुख है।

विषय का खेल तो बुद्धिपूर्वक नहीं है, यह तो सिर्फ मन की एंठन ही है। कोई भी बुद्धिमान ईंसान यदि बुद्धि से विषय