भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

कामवासना उत्पन्न क्यों होती है, यदि यह जान ले तो उसे क्राबू में लाया जा सकता है। लेकिन वस्तुस्थिति में वह कहाँ से उत्पन्न होती है, यह जानता ही नहीं। फिर क्राबू में कैसे ले सकता है? कोई क्राबू में नहीं ले सकता। जिसका ऐसा दिखता है, कि क्राबू में कर लिया है, वह तो पूर्व की भावना का फल है, बाकी कामवासना का स्वरूप कहाँ से उत्पन्न हुआ, उस उत्पन्न दशा को समझ ले और वहीं पर ताला लगा दिया जाए तभी उसे क्राबू में ले सकते हैं। इसके सिवा भले ही वह ताला लगाए या कुछ और करे फिर भी उसका कुछ चलेगा नहीं। काम-वासना नहीं करनी हो तो हम रास्ता दिखाएँगे।

अज्ञान की गलतियों की सजा इन्द्रियों को

प्रश्नकर्ता : ये जो इन्द्रियाँ हैं, वे भोगे बिना शांत नहीं होती। तो इसके अलावा और कोई उपाय है ?

दादाश्री : ऐसा कुछ भी नहीं है। बेचारी इन्द्रियाँ तो ठेठ तक भोग भोगती ही रहती हैं। उनमें जब तक सत्व रहे, तब तक। जीभ में अगर बरकत हो न तब उस पर हम कोई भी चीज रखे कि तुरंत उसका स्वाद हमें बता देगी, और बड़ी उम्र हो जाए और जीभ में बरकत नहीं रहे तो नहीं बताती। आखों में बरकत हो तो सभी, कोई भी चीज हो उसे बता देती है। बूढ़ापे की वजह से अगर बरकत जरा कम हो गई हो, तो नहीं बता सकती। अतः उम्र होने पर बेचारी इन्द्रियाँ तो अपने आप ही फीकी पड़ जाती हैं लेकिन ये विषय फीके नहीं पड़ते। ये इन्द्रियाँ विषयी नहीं हैं।

विषय इन इन्द्रियों का दोष नहीं है। इन्द्रियों को बिना वजह सजा देते हैं लोग। इन्द्रियों को, शरीर को सजा देते हैं न, सभी? वे भैंस की भूल पर चरवाहे को मारते हैं। भूल भैंस की और मारते हैं चरवाहे को। भूखा मारते हैं, बिना वजह। उनका क्यों नाम देता है तू? सीधा रह न। तेरा टेढ़ा है अंदर, नीयत चोर

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