भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

विकारों से विमुक्ति की राह (खं-1-2)

४१

दादाश्री : ऐसा है न, जब तक खुद पुरुष है, तब तक स्त्री के प्रति झुकाव रहेगा ही, जब तक जवानी है, तब तक। अब अस्सी साल के बूढ़े को नहीं होगा! दुकान का दिवाला निकल जाने के बाद क्या होगा? दिवालिया दुकान में कुछ माल होगा क्या? बच्चों को नौ साल तक नहीं होता। यह बीचवाली दुकान जरा जबरदस्त चलती है, जोरदार। तभी यह सब होता है। जब तक पुरुष हैं, तब तक यह वासना रहेगी और स्त्रियाँ हैं, तब तक वासना रहेगी लेकिन अगर पुरुष ही खत्म हो जाएँ तो?

प्रश्नकर्ता : उसे कैसे मिटा सकते हैं?

दादाश्री : जो वासनावाला है, वह चंद्रेश है और आप तो 'माइ नेम इज चंद्रेश' कहते हो। इसलिए आप अलग हो इससे। इस बात पर भरोसा है? तो वह आप कौन हो? इतना ही आपको मैं रियलाइज करवा देता हूँ तो आपकी वासना छूट जाएगी।

अब ये वासनाएँ क्या हैं? 'मैं चंद्रेश हूँ' यह मिटेगा, तभी वासनाएँ जाएँगी, वनाँ वासनाएँ नहीं जाएँगी। मैं तो क्या कहता हूँ कि 'आत्मा क्या है' वह जानो, 'अनात्मा क्या है' वह जानो। इतना जानते ही वासनाएँ गायब हो जाएँगी।

जितना डेवेलपमेन्ट ऊँचा, उतनी मूर्च्छा कम। इसमें क्या भोगना है? सबकुछ भोगकर ही आएँ हैं। जिसने कम भोगा है, उसे मूर्च्छा ज्यादा है।

विषय और कषाय की भेदरेखा

प्रश्नकर्ता : आप ने ये क्रोध-मान-माया-लोभ बताए हैं न, तो यह विषय किस में आता है? 'काम' किस में आता है?

दादाश्री : विषय अलग है और ये कषाय अलग हैं। विषयों की यदि हम हद पार करें, हद से ज्यादा माँगे तो वह लोभ है।