भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

न हो असार, पुद्गलसार (खं-2-१३)

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होता है। ऊर्ध्वगमन तो जब ब्रह्मचर्यव्रत लेना तय किया तभी से शुरुआत हो जाती है।

सावधानी से चलना अच्छा। महीने में चार बार हो जाए, फिर भी हर्ज नहीं है। हमें जान-बूझकर डिस्चार्ज नहीं करना चाहिए। वह गुनाह है। अपने आप हो जाए तो उसमें हर्ज नहीं। ये सब तो उल्टा-सीधा खाने का परिणाम है। जान-बूझकर डिस्चार्ज करना, वह भयंकर गुनाह है। आत्महत्या कहलाएगा। ऐसे डिस्चार्ज की छूट कौन देगा? वह भाई कह रहे हैं कि डिस्चार्ज भी नहीं होना चाहिए। ‘तब क्या मर जाऊँ? कुएँ में पड़ जाऊँ?’

प्रश्नकर्ता : डिस्चार्ज हो जाए तो वह गुनहगार बन जाता है, उसे मन में क्षोभ होता है। क्योंकि ये सब ऐसा ही कहते हैं न कि डिस्चार्ज नहीं होना चाहिए।

दादाश्री : वे लोग विषय करते हैं, उसके बजाय तो यह डिस्चार्ज बहुत अच्छा। वह दो लोगों को बिगाड़ता है, कुत्ते जैसा तो शोभा नहीं देता!

वीर्यशक्ति का ऊर्ध्वगमन कब?

प्रश्नकर्ता : वीर्य का गलन होता है, वह पुद्गल स्वभाव में होता है या फिर कहीं पर हमारा लीकेज हो तब होता है?

दादाश्री : किसी को देखकर तुम्हारी दृष्टि बिगड़ जाए, तब वीर्य का कुछ हिस्सा एकजॉस्ट हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : वह तो विचारों से भी हो जाता है।

दादाश्री : विचारों से भी एकजॉस्ट होता है, दृष्टि से भी एकजॉस्ट होता है। वह एकजॉस्ट हुआ माल फिर डिस्चार्ज होता रहता है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन ये जो ब्रह्मचारी हैं, उन्हें तो ऐसे कुछ संयोग नहीं मिलते, वे स्त्रियों से दूर रहते हैं, फोटो नहीं रखते,

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कैलेन्डर नहीं रखते, फिर भी उन्हें डिस्चार्ज हो जाता है। तो उनका डिस्चार्ज स्वाभाविक नहीं कहलाएगा?

दादाश्री : फिर भी उन्हें मन में यह सब दिखता है। दूसरा, अगर वह भोजन बहुत खाता हो और उसका वीर्य बहुत बने तो फिर वह प्रवाह बह जाता है, ऐसा भी हो सकता है।

प्रश्नकर्ता : रात को ज्यादा खा लिया तो खत्म...

दादाश्री : रात को ज्यादा खाना ही नहीं चाहिए, खाना हो तो दोपहर में खाना। रात को यदि ज्यादा खा लिया तब तो वीर्य का स्खलन हुए बिना रहेगा ही नहीं। वीर्य का स्खलन किसे नहीं होता है? जिसका वीर्य बहुत मजबूत हो गया हो, बहुत गाढ़ा हो गया हो, उन्हें नहीं होता। ये सब तो पतले हो चुके वीर्य कहलाते हैं।

प्रश्नकर्ता : मनोबल से भी उसे रोका जा सकता है न?

दादाश्री : मनोबल तो बहुत काम करता है! मनोबल ही काम करता है न! लेकिन वह ज्ञानपूर्वक चाहिए। यों ही मनोबल नहीं रह पाता न!

प्रश्नकर्ता : सपने में जो डिस्चार्ज होता है, वे क्या पिछली खामियाँ हैं?

दादाश्री : उसमें कोई शंका नहीं है। वे सभी पिछली खामियाँ स्वप्नावस्था में चली जाती हैं। स्वप्नावस्था के लिए हम गुनहगार नहीं माने जाएँगे। हम जागृत अवस्था को गुनहगार मानेंगे। खुली आँखों से जागृत अवस्था! फिर भी सपने आते हैं। अतः उन्हें बिल्कुल निकाल देने जैसा नहीं है, वहाँ सावधान रहना। स्वप्नावस्था के बाद सुबह पश्चाताप करना पड़ेगा, उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारी पाँच आज्ञा का पालन करे तो उसमें कभी भी विषय विकार हो सकें, ऐसा है ही नहीं।

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जोखिम, हृष्ट-पुष्ट शरीर के

यह पढ़, इसमें क्या लिखा है?

प्रश्नकर्ता : मैथुन संज्ञा चार प्रकार से जागृत होती है।

१) वेद मोहनीय के उदय से।

२) हड्डी, मांस, खून वगैरह से शरीर पुष्ट होने से।

३) स्त्री को देखने से।

४) स्त्री का चिंतवन करने से।

वेद मोहनीय उदय से, यानी?

दादाश्री : स्त्री को स्त्री वेद होता है, पुरुष को पुरुष वेद होता है, वह वेद जब उदय में आता है, तब वह विचलित कर देता है।

खास सावधानी कहाँ पर रखनी है कि 'खून और मांस से शरीर हृष्ट-पुष्ट होने से', वहाँ सावधान रहना है। तुम कहते हो कि हमें डिस्चार्ज हो जाता है तो उसमें यह कारण बाधक है। एक ओर श्रीखंड, पकोड़े, जलेबियाँ वगैरह खाते हो और फिर वीर्य को रोके रखना चाहते हो, वह कैसे हो सकेगा? शरीर को तो पोषण के लिए ही आहार देना चाहिए और वह भी भारी माल-मलीदेवाला भोजन नहीं। इस किताब में स्पष्ट लिखा हुआ है। इसीलिए तो मैंने यह किताब तुम्हें पढ़ने के लिए दी है। कई जैन साधु आर्यबिल (जैनों में किया जानेवाला व्रत, जब भोजन में एक ही प्रकार का धान खाया जाता है) करते हैं। आर्यबिल में कोई भी एक ही चीज़ खाते हैं हमेशा के लिए। पानी में रोटी डूबोकर खाते हैं, तब जाकर वे साधु ब्रह्मचर्य पालन कर सकते हैं। सदी के दिनों में ठंड में शरीर कस जाता है, गर्मी में धूप में कस जाता है। हमें तो ठंड-वंड सहन ही नहीं करनी है न! रजाई लाकर ओढ़ दी कि चला! इसीलिए सावधान रहना। यदि तुम्हें ब्रह्मचर्य

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पालन करना हो तो सावधान रहना पड़ेगा। वीर्य ऊर्ध्वगामी होने के बाद अपने आप चलता रहेगा। अभी तक वीर्य ऊर्ध्वगामी नहीं हुआ है। अभी भी इसका स्वभाव अधोगामी है। वीर्य ऊर्ध्वगामी हो जाए, तब सबकुछ ऊँचे चढ़ता है। फिर तो वाणी-बाणी बढ़िया निकलती है, भीतर दर्शन भी उच्च प्रकार का खिला हुआ रहता है। वीर्य के ऊर्ध्वगामी होने के बाद दिक्कत नहीं आएगी, तब तक तो खाने-पीने में बहुत नियम रखना पड़ता है। वीर्य को ऊर्ध्वगामी होने में तुम्हें मदद तो करनी पड़ेगी या यों ही चलता रहेगा?

प्रश्नकर्ता : मदद करनी पड़ेगी। आहार में क्या क्या बंद कर देना है? तला हुआ, घी, तेल वगैरह बंद कर देना पड़ेगा न?

दादाश्री : कुछ भी बंद नहीं करना है, उसकी मात्रा कम कर देनी है।

प्रश्नकर्ता : चावल, यह ब्रह्मचर्य के लिए बिल्कुल अंतिम आहार है, सही है न?

दादाश्री : नहीं, सिर्फ चावल पर नहीं। वह तो सिर्फ रोटी होगी, कुछ भी होगा फिर भी चलेगा। बाकी कुछ खास प्रकार का फूड नहीं लेने चाहिए। चरबीवाला और ऐसा वैसा आहार नहीं लो तो अच्छा रहेगा।

प्रश्नकर्ता : और, मीठा आहार?

दादाश्री : मिठाई भी नहीं। खट्टा चलेगा लेकिन वह भी हिसाब से, ज्यादा खट्टा नहीं खाना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : मिर्च?

दादाश्री : थोड़ी थोड़ी खा सकते हैं। मिर्च से अच्छी तो कालीमिर्च। ब्रह्मचर्य पालन के लिए सबसे अच्छी, सौंठ। अपने इन

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ब्रह्मचारियों के लिए ही झंझट है न? बाकी सभी को तो अपने इस विज्ञान में तो कोई झंझट ही नहीं है न? अपने इस विज्ञान में तो धीरे से निकाल कर लेना है। ये तो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, इसलिए सब कहना पड़ता है। अतः यदि यों कुछ सालों तक ब्रह्मचर्य संभल गया, कंट्रोलपूर्वक, तो फिर वीर्य ऊर्ध्वगामी हो जाएगा और तब ये शास्त्र-पुस्तकें ये सब दिमाग में धारण कर सकेंगे। धारण करना, कोई आसान चीज नहीं है, वर्ना पढ़ता है और फिर भूलता जाता है।

प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा ही होता है अभी।

दादाश्री : अब यदि वीर्य ऊर्ध्वगामी हो चुका हो तभी वह धारण कर सकता है, नहीं तो धारण नहीं कर सकता।

प्रश्नकर्ता : ये जो प्राणायाम करते हैं, योग करते हैं, वे ब्रह्मचर्य के लिए कुछ हेल्पफुल हो सकते हैं?

दादाश्री : वैसा अगर ब्रह्मचर्य के भाव से करे तो हेल्पिंग हो सकता है। ब्रह्मचर्य का भाव होना चाहिए और आपको शरीर स्वस्थ रखने के लिए करना हो तो उससे शरीर स्वस्थ रहेगा। यानी भाव पर ही सारा आधार है लेकिन इन सब में आप मत पड़ना, वर्ना अपना आत्मा रह जाएगा।

प्रश्नकर्ता : जहाँ स्त्री बैठी हो, उस बैठक पर ब्रह्मचारी को नहीं बैठना चाहिए?

दादाश्री : यह तो पुराने जमाने की बात हुई। अभी इस काल में यह माफिक नहीं आया। वह सब मैंने निकाल दिया है। क्योंकि अगर बस में कोई स्त्री उठे और आप नहीं बैठे तो कहाँ बैठोगे? तो क्या खड़े रहोगे? और अगर वह स्त्री उठ जाए और आप ऐसा कहो कि 'मैं नहीं बैठ सकता' तो लोग तुम्हें ऐसा कहेंगे कि 'घनचक्कर है।' तुम मूर्ख नहीं दिखो इसलिए मैंने पहले से ही सबकुछ निकाल दिया है। ऐसी तो बहुत सी बातें हैं। यहाँ स्त्री की फोटो भी नहीं

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लटका सकते। फिर गाय को भी नहीं देख सकते, गाय स्त्री है इसलिए। अब इसका अंत कब आएगा? शास्त्रकारों ने तो बहुत बारीक बुना है जबकि हमें तो दरियाँ बनानी हैं। इसलिए अब मोटा-मोटा बुनो न! फिर भी हमें कैसा आनंद-आनंद रहता है! वहाँ तो कभी भी आनंद ही नहीं रहता और ऐसा बारीक बुनने में बेचारा उलझ जाता है। हाँ, नहाने की उन लोगों की बात मैं एक्सेप्ट करता हूँ। नहाना नहीं, खाना, ब्रश नहीं करना, वह सब एक्सेप्ट करता हूँ। नहाना नहीं चाहिए क्योंकि नहाने से शरीर की सभी इन्द्रियाँ सतेज हो जाती हैं। जीभ साफ की कि ये सब जलेबी-पकोड़े भाएँ और नहीं की हो तो स्वाद में ‘राम तेरी माया!’ स्वाद कम पता चलता है।

प्रश्नकर्ता : ये साधु गीले कपड़े से शरीर पोंछ लेते हैं।

दादाश्री : वह तो करना ही पड़ेगा न!

प्रश्नकर्ता : उससे इन्द्रिय सतेज नहीं होती?

दादाश्री : नहीं।

प्रश्नकर्ता : गरम या ठंडा पानी हो तो क्या उससे फर्क पड़ता है?

दादाश्री : उसमें कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। गरम पानी अंदर ठंडक करता है और ठंडा पानी अंदर गर्मी करता है। उसका स्वभाव अंदर बदलाव लाने का, बाकी सब एक सा ही है।

निरोगी से भागें विषय

आप परिणाम को बाहर दूँढ रहे हो, लेकिन जो निरोगी होता है, उसका परिणाम हमेशा ही जल्दी पता चलता है। ये सब प्रमाण हैं! शरीर निरोगी हो तो ब्रह्मचर्य अच्छा रहता है। अब्रह्मचर्य शरीर के रोगों की वजह से ही रहता है। जितना रोग कम, उतना विषय कम। दुबले इंसान में विषय अधिक होता है और मोटे इंसान में विषय कम होता है।

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प्रश्नकर्ता : यानी रोगों की वजह से अब्रह्मचर्य है?

दादाश्री : रोगों से ही अब्रह्मचर्य है। निरोगी इंसान को अब्रह्मचर्य का झंझट ही नहीं रहता! उसे वह अच्छा ही नहीं लगता। उसे तो निरोगीपन का ही आनंद रहता है, इसलिए उसे विषय अच्छा ही नहीं लगता जबकि इस शरीर का तो... अभी ऐसा रोगी हो गया है, यानी इस काल में निरोगी हैं ही नहीं न! निरोगी तो सिर्फ तीर्थंकर होते हैं!

प्रश्नकर्ता : तो हमें निरोगी बनने के लिए, ब्रह्मचर्य पालन के लिए इस शरीर का भी ध्यान रखना पड़ेगा न?

दादाश्री : शरीर का ध्यान तो ऐसी चीज है कि आपके लिए अब यह निकाली बात है। ऐसा ध्यान तो कब रखना होता है, कि कर्ता साथ में हो तब। हमें भाव रखना है कि बांडी निरोगी होनी चाहिए, ऐसा पक्षपात रहना चाहिए और फिर शरीर को जरा संभालना।

प्रश्नकर्ता : कोई इंसान तंदुरुस्त है, तो वह तंदुरुस्ती किस चीज के आधार पर टिकी हुई है? शारीरिक शक्ति का आधार वीर्य शक्ति है न!

दादाश्री : इन स्त्रियों में वीर्य नहीं होता, फिर भी शारीरिक शक्ति बहुत होती है।

प्रश्नकर्ता : तो तंदुरुस्ती का जो स्तर है, वह किस आधार पर तय होता है?

दादाश्री : वह रोग मुक्तता पर आधारित है। रोग नहीं होता तब शक्ति अधिक होती है। रोग के कारण शक्ति कम हो जाती है।

वीर्य शक्ति अलग चीज है। वीर्य तो हर एक के अंदर होता ही है, रोगी हो या निरोगी हो, दोनों में, सभी में होता है। दुबले

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इंसान में वीर्य शक्ति अधिक होती है और मोटे में कम होती है। दुबले में अधिक होती है। दुबला अधिक कामी होता है, मोटा कम कामी होता है। क्योंकि इसका ख़ाया हुआ, सारा मांस बन जाता है, और इसका ख़ाया हुआ सारा वीर्य बन जाता है।

प्रश्नकर्ता : जो इंसान मोटा होता है, उसमें चरबी का भाग मांस से भी ज्यादा होता है।

दादाश्री : हाँ, उसका ख़ाया हुआ सारा चरबी और मांस बन जाता है। इसका ख़ाया हुआ सारा हड्डी बन जाता है। मोटे इंसान को कितना खून चाहिए? जबकि उसे तो, दुबले को तो खून ही नहीं चाहिए न। उसके सभी कारखाने चलते रहते हैं, इसलिए फिर बचा-खुचा वीर्य बन जाता है। कुछ समझ में आ रहा है? मोटे इंसान में विषय बहुत कम होता है। उसमें स्ट्रेन्थ (शक्ति) भी कम होती है।

प्रश्नकर्ता : एक बार ऐसा सुना था कि पुद्गल का फोर्स बढ़ जाए, पुद्गल की शक्ति बढ़ जाए तो विषय में खिंच जाता है, यह सच है?

दादाश्री : शरीर का ठिकाना नहीं हो और टूँस-टूँसकर खाना खाता हो तो वह ब्रह्मचर्य नहीं टिकता, अब्रह्मचर्य हो जाता है। यदि शरीर मजबूत हो, लेकिन आहार कम लेता हो तो वह ब्रह्मचर्य संभाल सकता है। बाकी जिसे श्री विज्ञान से वैराग आ जाता है, उसे तो अब्रह्मचर्य हो ही नहीं सकता। इस गटर को एक बार खोलकर देख लिया हो तो दोबारा खोलेगा ही नहीं न! खोलने की इच्छा ही नहीं होगी न? उसकी तो उस तरफ नज़र ही नहीं जाएगी। ब्रह्मचर्य तो कैसा होता है? हजार स्त्रियों के बीच भी मन न बिगड़े, उसे विचार तक नहीं आए। मन बिगड़ा तो सबकुछ बिगड़ गया क्योंकि वह चार्ज स्वरूप है इसलिए तुरंत चार्ज हो जाता है और चार्ज हुआ तो डिस्चार्ज होगा ही!

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ज्ञानी की सूक्ष्म बातें

प्रश्नकर्ता : विषय के अलावा अन्य विचार आएँ और काफी देर तक चलते रहें, तो क्या करना चाहिए?

दादाश्री : भले ही चले, उसमें दिक्कत क्या है? उन्हें देखते रहना है कि क्या आए और क्या नहीं। सिर्फ देखते ही रहना है और नोट भी नहीं करना है। जैसे पानी गिरता रहता है, वैसे ही विचार चलते रहते हैं। हमें उन्हें देखते रहना है।

प्रश्नकर्ता : खराब विचार आएँ तो प्रतिक्रमण करते जाना है?

दादाश्री : विचार खराब होता ही नहीं है। खराब विचार और अच्छा विचार, वे नाम तो संसार के लोगों ने दिए हैं। जिसे आत्मज्ञान है, उसके लिए विचार मात्र ज़ेय हैं। विचार को खराब कहेंगे तो फिर मन चिढ़ जाएगा। हम क्यों किसी को बुरा कहें? वह उसका स्वभाव ही है। अच्छा विचार हो या दुर्विचार, मन दिखाता ही रहेगा। उन्हें हमें देखते रहना है।

मन में जो विचार आते हैं, वे उदयभाव कहलाते हैं। उस विचार में खुद तन्मयाकार हुआ तो आश्रव (कर्म में उदय की शुरुआत, उदय कर्म में तन्मयाकार होना) हुआ कहलाएगा। इससे फिर कर्म जमने लगेंगे। लेकिन यदि उसे मिटा देंगे तो फिर मिट जाएगा। यदि उसका काल पक जाए और अवधि पूरी हो जाए तो बंध पड़ जाएगा। इसलिए अवधि पूरी होने से पहले मिटा देना पड़ेगा, तो फिर उससे बंध नहीं पड़ेगा। इसलिए हमने कहा है न, अतिक्रमण तो हो ही जाएगा, लेकिन फिर तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना। ताकि फिर बंध न पड़े।

शरीर तो परेशान नहीं करता न?

प्रश्नकर्ता : नहीं, यों तो ऐसा लगता है कि मन ही परेशान

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करता है, शरीर परेशान करे, ऐसा नहीं लगता। बाकी ये जो भोग भोगते हैं, उससे शरीर को एक तरह की तृप्ति मिलती है।

दादाश्री : हाँ, वह संतोष होता है। संतोष यानी क्या कि किसी भी प्रकार की इच्छा हुई, शराब पीने की इच्छा हुई तो आखिर में जब वह शराब पीता है, तब उसे संतोष होता है। फिर भले ही कैसी भी बेवकूफ जैसी इच्छा होगी फिर भी उसे संतोष होगा।

प्रश्नकर्ता : लेकिन दादा, पहले तो वह मन पर ही असर करता है, तो देह का जोर बढ़ जाता है न ?

दादाश्री : नहीं, देह में और मन में इतना संबंध नहीं है। क्योंकि छोटे बच्चे भी आहार अधिक खाते हैं। उससे शरीर का जोर बहुत रहता है। उनका मन इस विषय के बारे में जागृत नहीं होता, फिर भी उनके शरीर पर असर दिखता है।

प्रश्नकर्ता : क्या असर दिखता है ?

दादाश्री : 'इन्द्रिय' टाइट हो जाती है, लेकिन उसके मन में कुछ नहीं होता। यानी शरीर का असर इतना नुकसान करे, ऐसी चीज नहीं होती। लेकिन लोग तो उल्टा मान लेते हैं। यह तो उल्टी मान्यताएँ हैं सारी। बाकी छोटे बच्चे कुछ विषय को नहीं समझते, उनके मन में विषय जैसा कुछ होता भी नहीं है। फिर भी यह शरीर का बल है। आहार और दूध वगैरह सब खाते हैं, इसलिए इन्द्रिय टाइट हो जाती है। इससे ऐसा मान लेना कि वह शरीर को नुकसान पहुँचाता है, तो वह गलत है। यह सारा मन का ही रोग होता है। मन का रोग ज्ञान से चला जाए ऐसा होता है, तो फिर हमें इसमें परेशानी कहाँ आती है ?

प्रश्नकर्ता : अभी भी कुछ ठीक से समझ में नहीं आ रहा है। तो शरीर को कोई निष्पत्ति ही नहीं होती ?

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दादाश्री : हाँ, निष्पत्ति ही नहीं है।

प्रश्नकर्ता : तो शरीर को एकदम सुखा देना चाहिए और ऐसा मानना कि शरीर अच्छा होगा तो नुकसान होगा? इसमें ऐसा मान लेने की जरूरत नहीं है?

दादाश्री : ऐसा कुछ इतना ज्यादा मान लेने की जरूरत नहीं है और ऐसे घबराकर अभी आहार ज्यादा नहीं लोगे तो फिर वह शरीर को नुकसान पहुँचाएगा। मतलब इसका किसी को उल्टा अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि दादा ने आहार की छूट दी है।

प्रश्नकर्ता : मतलब नॉर्मिलिटी रखकर लेना चाहिए, ऐसे?

दादाश्री : नॉर्मिलिटी मतलब घी-तेल, ऐसी कुछ चीजें तो कम कर ही दो। क्योंकि इन सबका शरीर पर असर होता है।

यह समझ में आया न? टाइट होना, वह शरीर का स्वभाव ही है। इसमें उल्टा मान लेते हैं कि दोष मन का ही है, मन है इसलिए ऐसा हो रहा है। ऐसा मान लेने की गलती हो जाती है। लेकिन ऐसा खुलासा होने के बाद यह मान लेने की गलती नहीं करेगा। इस शरीर पर असर हुआ, ऐसा कुछ होने से 'भूख' लगी, ऐसा कैसे कह सकते हैं हम? मैं क्या कहना चाहता हूँ, वह समझ में आ रहा है? छोटे बच्चे, वगैरह को देखा है? उसकी स्टडी नहीं की है? ये सुना न? अब स्टडी करना ताकि यह गलत मान्यता खत्म हो जाए।

प्रश्नकर्ता : मन से विषय भोगते हैं और शरीर से भोगते हैं, तो इन दोनों में कर्म किस में ज्यादा बंधेगा? गाँठ किस में पड़ेगी?

दादाश्री : मन से भोगने में ज्यादा होता है।

प्रश्नकर्ता : जब स्थूल में भोगने की बारी आती है, तब मन से तो पहले भोग ही लिया होता है न?

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दादाश्री : मन भोग भी सकता है या नहीं भी।

प्रश्नकर्ता : सिर्फ मन से भोग रहा है, तब गॉठ पड़ती है, और मन और काया दोनों साथ में हों तो उसका कैसा कर्म बंधेगा?

दादाश्री : जहाँ मन आया, वहाँ सबकुछ बिगड़ता है और कई तो, मन, देह और चित्त से भोगते हैं, वह तो बहुत खराब है।

प्रश्नकर्ता : चित्त से भोगना मतलब क्या?

दादाश्री : फिल्म से भोगना, तरंगें (शेखचिल्ली जैसी कल्पनाएँ) भोगना, तरंगी भोगवटा कहते हैं उसे!

प्रश्नकर्ता : मन का जो विषय उत्पन्न होता है और शरीर का जो विषय उत्पन्न होता है, इन दोनों में जोखिमवाला कौन सा?

दादाश्री : शरीर से जो विषय उत्पन्न हुआ, अगर उस पर ध्यान नहीं देंगे तो चलेगा लेकिन मन से विषय नहीं होना चाहिए। ये सभी लोग शरीर के विषय से धोखा खा जाते हैं। उसमें धोखा खाने की कोई वजह नहीं है। मन में नहीं रहना चाहिए। विषय के बारे में मन साफ हो जाना चाहिए, मन निवृत्त हो जाना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : यानी मूल बीज तो मन से ही पड़ते हैं, ऐसा?

दादाश्री : अगर मन में होगा, तभी वह विषय है, वना वह विषय नहीं है। इन्द्रिय टाइट हो जाए फिर भी मन न जागे, ऐसा है लेकिन लोग तो क्या कहते हैं कि इन्द्रिय टाइट होने के बाद मन में आता है। टाइटेनेस न आए उसके लिए इन लोगों ने क्या किया कि आहार कम करो, आहार बंद करो, दूध बंद करो ताकि इन्द्रिय नरम पड़ जाए और टाइटेनेस नहीं आए, इससे मन में नहीं आएगा। यानी इन लोगों की बात गलत है, ऐसा आपको समझ में आ रहा है? ये सारी बहुत सूक्ष्म बातें बता रहा हूँ, समझने में जरा देर लगे, ऐसी है।

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उल्टी हो गई तो क्या मर जाना चाहिए?

ब्रह्मचर्य व्रत लिया हो और कुछ उल्टा-सीधा हो जाए न, तब उलझ जाता है। एक लड़का उलझ रहा था, मैंने कहा, 'क्यों भाई, उलझन में हो?' आपसे बताते हुए मुझे शर्म आ रही है। मैंने कहा, 'क्या शर्म आ रही है? लिखकर दे दे।' मुँह से कहने में शर्म आती है तो लिखकर दे दे। 'महीने में दो-तीन बार मुझे डिस्चार्ज हो जाता है', कहता है। 'अरे पगले, इसमें तो क्या इतना घबरा जाता है? तेरी नीयत नहीं है न? तेरी नीयत खराब है?' तो कहता है, 'बिल्कुल नहीं, बिल्कुल नहीं।' तब मैंने कहा, तेरी नीयत साफ हो तो ब्रह्मचर्य ही है', कहा। तब कहने लगा, 'लेकिन क्या ऐसा हो सकता है?' मैंने कहा, 'भाई, वह क्या गलन नहीं है? वह तो जो पूर्ण हुआ है, वह गलन हो जाता है। उसमें तेरी नीयत नहीं बिगड़नी चाहिए। ऐसा रखना कि संभालना है। नीयत नहीं बिगड़नी चाहिए कि इसमें सुख है।' अगर अंदर उलझ जाए न बेचारा तो तुरंत ठीक कर देता हूँ।

प्रश्नकर्ता : नीयत ही मूल चीज है! 'नियत कैसी है' उसी पर आधारित है सबकुछ।

दादाश्री : तेरी नीयत किस तरफ की है? तेरी नीयत खराब हो और शायद डिस्चार्ज नहीं हो तो इसका मतलब यह नहीं है कि तू ब्रह्मचारी बन जाएगा। भगवान बहुत पक्के थे, कौन ऐसे समझाएगा? और कुदरत तो अपने नियम में ही है न! उल्टी हो जाए तो मर जाएगा, क्या ऐसा हो गया? शरीर है तो उल्टी नहीं होगी तो क्या होगा? रोज सुल्टी होती है तो फिर उल्टी नहीं होगी वापस?

प्रश्नकर्ता : अभी लास्ट थोड़े समय में कई बार पतन हो गया था, डिस्चार्ज हो गया था।

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दादाश्री : तुम्हारा चित्त जितना किसी में चिपके उतना ही अंदर अपने आप डिस्चार्ज हो जाता है, फिर वह निकल जाता है। जो मृत हो जाता है, वह निकल जाता है। जो मृत नहीं होता, वह नहीं निकलता।

प्रश्नकर्ता : नहीं। उसका मतलब क्या यह हुआ कि अभी भी कहीं पर चित्त चिपकता है।

दादाश्री : हं, चिपका नहीं। अंदर चिपकता होगा थोड़ा बहुत, उसका फल है। चिपकने के बाद यह सब उखाड़ लो, यों प्रतिक्रमण करके। थोड़ा चिपक जाता है न? यानी चिपक जाए तो नियम ऐसा है कि अंदर वह तुरंत अलग हो जाता है और फिर मृत हो जाता है। वह तो अंदर रहता है, उसके बजाय अगर निकल जाए तो उसमें परेशान मत होना।

प्रश्नकर्ता : तो ऐसा समझना है कि यदि चित्त का चिपकना कम हो जाए तो डिस्चार्ज होने का जो गेप है, वह बढ़ता जाएगा?

दादाश्री : नहीं, ऐसा नहीं। डिस्चार्ज का गेप बढ़ा होगा तो वह वापस कम भी हो सकता है, थोड़े दिनों बाद। इसान का संडास जाना और डिस्चार्ज होना, इनमें अंतर नहीं है।

प्रश्नकर्ता : तंदुरस्त इंसान को डिस्चार्ज होता है, अपने आप ऑटोमैटिक कुछ समय पर होता है।

दादाश्री : होता है। पुद्गल संडास गया, उसे ऐसा कहेंगे तो राह पर आ जाएगा। इस शरीर में से जो कुछ भी निकलता है, वह सब संडास ही कहलाता है। नाक में से निकले, कहीं से भी निकले, वह संडास ही कहलाता है।

प्रश्नकर्ता : तो इसे नुकसान हुआ, ऐसा ही कहेंगे न?

दादाश्री : नुकसान तो डिस्चार्ज होने से पहले से ही हो गया है। अंदर अलग हो जाता है, तभी से नुकसान है। अब फायदे

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या नुकसान को क्या करना है? हमें तो इतना ही देखना है कि आत्मा मजबूत रहता है या नहीं?

इस शरीर में से जो निकलता है, वह सारा संडास का माल। संडास का माल बनता है, तब बाहर निकलता है। तब तक बाहर नहीं निकलता। जब तक इस शरीर का माल हो न, तब तक बाहर नहीं निकलता।

विचार : मंथन : स्खलन

संडास का माल निकल ही जाता है समय आने पर, रहता नहीं है। अभी कोई विषय का विचार आया, तुरंत तन्मयाकार हुआ तब अंदर माल झड़कर नीचे चला जाता है। और फिर इकट्ठा होकर निकल जाता है एकदम। लेकिन विचार आते ही अगर तुरंत उखाड़ दे तो फिर अंदर झड़ेगा नहीं, ऊर्ध्वगामी हो जाएगा। वर्ना विचार आते ही झड़ जाता है। अंदर इतना विज्ञान है पूरा!!

प्रश्नकर्ता : विचार आते ही।

दादाश्री : ऑन द मोमेन्ट। बाहर नहीं निकलता। लेकिन अंदर अलग हो जाता है वह। जो बाहर निकलने लायक हो गया, वह शरीर का माल नहीं रहा।

प्रश्नकर्ता : तो क्या प्रतिक्रमण करने से वापस ऊर्ध्वगमन होगा?

दादाश्री : विचार आए और विचार में तन्मयाकार नहीं हो, विचार को देखते रहे तो ऊर्ध्वगमन होगा। विचार आए और तन्मयाकार हो जाए, तो फिर अलग हो जाता है, तुरंत।

प्रश्नकर्ता : अलग होने के बाद प्रतिक्रमण कर ले तो वापस ऊपर जाएगा क्या? ऊर्ध्वगमन नहीं हो सकता?

दादाश्री : प्रतिक्रमण करते हैं तो क्या होता है? कि तुम

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उससे अलग हो। ऐसा अभिप्राय जाहिर करते हैं कि हमें इससे लेना देना नहीं है।

प्रश्नकर्ता : वीर्य के ऊर्ध्वगमन का डिस्चार्ज के साथ कुछ रिलेशन है क्या?

दादाश्री : डिस्चार्ज हुआ मतलब ऊर्ध्वगमन से अधोगमन हो गया।

प्रश्नकर्ता : इसका मतलब अगर वीर्य का ऊर्ध्वगमन हो जाए तो डिस्चार्ज बंद हो जाएगा न धीरे धीरे!

दादाश्री : नहीं। ऐसा कोई नियम नहीं है। डिस्चार्ज भी होता है, डिस्चार्ज की तो, उसकी जोखिमदारी नहीं मानी जाती। जान-बूझकर डिस्चार्ज हो, तब फिर जोखिम है। अभी तो भीतर सिर्फ आहार का दबाव आए या दूसरा कोई दबाव आए, तब भी हो जाता है। जान-बूझकर नहीं होना चाहिए।

हो सके, तब तक डिस्चार्ज नहीं हो, ऐसी सावधानी रखनी है। विषय का विचार भी नहीं आना चाहिए और आए तो फेंक देना है, अंकुर फूटते ही फेंक देना चाहिए। तब जो वीर्य है, जो कि पुद्गल का एक्स्ट्रैक्ट है, वह ऊपर चढ़ता है। वह ऊर्ध्वरता होता है। फिर वाणी वगैरह सब किलयर रहती है। जागृति बहुत अच्छी रहती है। तुझसे रहा जा सकेगा न, मैं जो कह रहा हूँ, वैसा?

भरा हुआ माल है, वह तो निकले बिना रहेगा ही नहीं। विचार आया उसे पोषण दिया, तो वीर्य मृत हो जाता है। फिर किसी भी रास्ते डिस्चार्ज हो जाता है और यदि अंदर टिक गया, विषय का विचार ही नहीं आया तो ऊर्ध्वगामी हो जाएगा। वाणी वगैरह सभी में मजबूत होकर आएगा। वरना विषय को तो हमने संडास कहा हुआ ही है। सबकुछ जो खड़ा होता है, वह संडास बनने के लिए ही होता है। जो ब्रह्मचर्य पालन करता है, उसमें

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सबकुछ आ जाता है। उसे खुद को वाणी में, बुद्धि में, समझ में, सब में आ जाता है, प्रकट होता है। वर्ना अगर वाणी बोले तो खिलती नहीं है, उगती भी नहीं न। वह ऊर्ध्वगामी हो जाए तो वाणी फस्टक्लास हो जाते हैं और फिर सारी शक्तियाँ खड़ी हो जाती हैं। आवरण टूट जाते हैं सारे।

प्रश्नकर्ता : उखाड़कर फेंक देने का मतलब विचार को सिर्फ देखना है?

दादाश्री : सिर्फ देखना ही है। देखना तो बड़ी बात है, यह तो विचार आया कि तन्मयाकार हो जाए तो उसे फेंक देना है। लेकिन अगर देख पाए तो फिर फेंकना नहीं पड़ेगा न।

प्रश्नकर्ता : यह ज्यादा आसान है।

दादाश्री : विषय का विचार तो कब आता है? यों देखा और आकर्षण हुआ तो विचार आ जाता है। कभी ऐसा भी होता है कि आकर्षण हुए बिना विचार आ जाता है। विषय का विचार आते ही मन में एकदम मंथन होता है और जरा सा भी मंथन हो तो फिर उसका स्खलन हो ही जाता है, तुरंत, ऑन द मोमन्ट। इसलिए हमें पौधा उगने से पहले ही उखाड़ देना चाहिए। बाकी सबकुछ चलेगा, लेकिन यह पौधा बहुत खराब है। जो स्पर्श हानिकारक हो, जिस इंसान का संग हानिकारक हो, वहाँ से दूर रहना चाहिए। तभी तो शास्त्रकारों ने इतना सब सेट किया था कि जहाँ स्त्री बैठी हो, वहाँ उस जगह पर मत बैठना। यदि ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो, और यदि संसारी रहना हो तो वहाँ आराम से बैठना, रहना।

ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो 'ज्ञानीपुरुष' से समझ लेना चाहिए। पहले यह ज्ञान समझ लेना पड़ेगा और यह ज्ञान समझ में आना चाहिए। ब्रह्मचर्य तो, जब मन बिल्कुल भी नहीं डिगे, तब वह ब्रह्मचर्य दिमाग में घुसता है और बाद में उसकी वाणी-

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

वर्तन सभी कुछ बदल जाता है!!! वर्ना तब तक तो पुद्गलसार धुलता ही रहता है सारा। यह जो आहार खाया न, उसका सारा सार खत्म हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : मन को प्रशिक्षित करने में कुछ समय तो बीत ही जाएगा न?

दादाश्री : मन को प्रशिक्षित करने में तो ऐसे कितना समय बीत गया? अनादि काल से कर रहे हैं, यह सब।

प्रश्नकर्ता : हाँ, लेकिन जैसा आप कह रहे हैं, मन को उस तरह से प्रशिक्षित करने में कुछ समय तो बीत ही जाएगा न? मन क्या एकदम से प्रशिक्षित हो सकता है?

दादाश्री : थोड़ा समय लेता है, छः बारह महीने लेता है।

प्रश्नकर्ता : यानी पहले आकर्षण होता है और फिर विचार आता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। यों ही विचार भी आ सकते हैं?

दादाश्री : विचार तो यों ही आ सकते हैं।

प्रश्नकर्ता : फिर जब विचार आते हैं, उसके बाद मंथन शुरू होता है।

दादाश्री : विचार आते ही मंथन शुरू हो जाता है, लेकिन यदि प्रतिक्रमण नहीं करे तो। इसलिए हम कहते हैं कि विचार आते ही तुरंत उखाड़कर फेंक देना। एक क्षणभर के लिए भी विचार को रखना नहीं चाहिए, प्रतिक्रमण करके तुरंत फेंक देना।

प्रश्नकर्ता : और जिसे बहुत ही स्पीडली विचार आईं तो?

दादाश्री : बहुत स्पीडली में तो उसे समझ में ही नहीं आएगा। क्योंकि अंदर मंथन हो चुका होता है, फिर मंथन से पूरा

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सार मर जाता है। उसके बाद वह मरा हुआ अंदर पड़ा रहेगा। फिर जब सब इकट्ठा हो जाता है, उसके बाद बाहर निकलता है। तब उसे तो ऐसा ही लगता है कि आज मुझे डिस्चार्ज हो गया। डिस्चार्ज तो था ही अंदर, हो ही रहा था। वह बूंद-बूंद करते डिस्चार्ज होता रहता है।

प्रश्नकर्ता : बहुत पहले बात निकली थी, तब आपने कहा था कि जब अंदर तन्मयाकार होता है, उसी समय परमाणुओं का स्खलन होता है।

दादाश्री : बस, तन्मयाकार का मतलब ही मंथन। यदि इतना ही समझ ले, तब तो ब्रह्मचर्य का सबसे बड़ा साइन्स समझ जाएगा। विचार आया और तन्मयाकार हो जाए तो अंदर स्खलन हो जाता है, लेकिन इन लोगों को समझ में नहीं आता, समझ ही नहीं है। उस समय भान ही नहीं रहता न! फिर भी प्रतिक्रमण करते हैं तो उससे चल जाता है।

प्रश्नकर्ता : यानी कि जैसे ही विचार आएँ, तभी से सावधान हो जाना है?

दादाश्री : विचार आया और यदि प्रतिक्रमण नहीं किया तो खत्म।

प्रश्नकर्ता : तो वास्तव में तो विचार ही नहीं आना चाहिए न?

दादाश्री : विचार तो आए बिना रहेंगे नहीं। अंदर भरा हुआ माल है, इसलिए विचार तो आएँगे, लेकिन प्रतिक्रमण उसका उपाय है। विचार नहीं आना चाहिए, ऐसा हो जाए तो गुनाह है।

प्रश्नकर्ता : वहाँ तक की स्टेज आनी चाहिए, ऐसा?

दादाश्री : हाँ, लेकिन विचार नहीं आना, वह तो बहुत समय के बाद डेवेलप होते-होते जब आगे बढ़ेगा, प्रतिक्रमण करते-करते

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आगे बढ़ेगा, तब उसके बाद पूर्णाहुति होगी न! प्रतिक्रमण करने लगे तो फिर पाँच जन्मों में, दस जन्मों में भी पूर्णाहुति हो जाएगी न। एक जन्म में शायद खत्म न भी हो।

प्रश्नकर्ता : जो विचार आते हैं, वह भरा हुआ माल है?

दादाश्री : वह सब भरा हुआ माल ही है न! विचार अपने आप ही आते हैं।

प्रश्नकर्ता : कभी कभार ऐसा भी होता है कि विचार भी चलते रहते हैं और प्रतिक्रमण भी चलते हैं, दोनों क्रियाएँ साथ में चलती हैं।

दादाश्री : उसमें हर्ज नहीं है। भले ही विचार चलते रहें, लेकिन अगर साथ में प्रतिक्रमण भी चलते रहें तो फिर उसमें हर्ज नहीं है।

प्रश्नकर्ता : यह तो गजब का साइन्स उजागर हुआ है, दादा!

दादाश्री : लेकिन लोगों को समझ में नहीं आ सकता न! यह तो सब पढ़ते हैं इतना ही, फिर भी इतना पढ़ते हैं, वह भी अच्छा है, जिम्मेदारी समझें तो भी बहुत हो गया! जोखिमदारी समझ में आ जाए तो भी बहुत हो गया। यह तो ऐसा समझता है कि विचार आ गया, तो उसमें क्या बिगड़ गया? लेकिन वह तो अभानता है। फिर भी जो बहुत विचारवंत हो, ब्रिलियेन्ट हो, उसे तो ठीक से समझ में आ जाता है और वह बात को समझ भी सकता है, उसे हेल्प भी होती है। यह तो लोग जानते नहीं है कि विचार आ जाए तो क्या होगा? ये तो कहेंगे कि विचार आया तो उसमें क्या बिगड़ गया? लोगों को पता नहीं होता कि विचार में और डिस्चार्ज में, इन दोनों की लिंक कैसे है? यदि अपने आप यों ही विचार नहीं आए तो बाहर देखने से भी विचार उत्पन्न हो सकता है।