भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लाए हैं। इसलिए उन्हें निराई नहीं करनी पड़ती। नींद में भी ब्रह्मचर्य चलता रहता है।

नूर झलकता है ब्रह्मचर्य का

सचमुच में ब्रह्मचर्य तो वह है कि मुँह पर जबरदस्त नूर हो। ब्रह्मचारी पुरुष तो कैसा होता है? इन लड़कों में कहाँ तेज दिखता है? क्योंकि ये सभी ‘ऑवरड्राफ्टवाले’ हैं। इसलिए जितनी बैंकों ने उधार दिया, उतना सभी कुछ लेकर आए है। तो अभी जो ब्रह्मचर्य पालन कर रहे हैं, बल्कि वह सारा तो बैंकों में भर-भरकर थक गए है। अभी तक बैंकों में ‘पार वैल्यू’ नहीं आई है। ‘पार वैल्यू’ होने के बाद चेहरे पर लाइट आएगी। उस लाइट को आते-आते तो बहुत टाइम लगेगा। फिर भी इन्हें चौबीसो घंटे जागृति रहती है। क्योंकि आत्मा प्राप्त हुआ है, इसलिए आत्मा की जागृतिवाले हैं। और इस ब्रह्मचर्य के लिए भी जागृति चाहिए। शायद आत्मा की जागृति नहीं हो और जरा सा झोंका आ जाए तो चलेगा, लेकिन ब्रह्मचर्य के लिए तो जरा सा भी झोंका खाए तो चलेगा ही नहीं न! चारों तरफ से साँप घुस गए, जिन्होंने ऐसा देखा तो उन्हें नींद नहीं आती। जिन्होंने नहीं देखा, वे सो जाते हैं। साँप देख लेने के बाद कैसे सो सकते हैं?

ये लड़के दीक्षा लेने की भावनावाले हैं। अंदर खुद का मोक्ष तो हो ही गया है। इसलिए उसे ढूँढने की तो इच्छा होती ही नहीं न! खुद का मोक्ष हुआ हो तो जगत् कल्याण करने की भावना होती है, नहीं तो अगर खुद का ही कल्याण नहीं हुआ हो, वहाँ जगत् कल्याण करने की भावना कैसे होगी? ये ब्रह्मचारी क्या कहते हैं कि, ‘हमारा तो कल्याण हो गया, अब हमें जगत् का कल्याण करना है, तो हमें क्या करना चाहिए?’ तब मैंने उनसे कहा, ‘अब शादी कर लो।’ तब वे कहते हैं कि ‘नहीं, हमें शादी तो करनी ही नहीं है। शादी करने से जगत् का कल्याण करने में दिक्कत आएगी, ऐसा है।’ तब मैंने उनसे

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कहा कि, 'तो तुम ब्रह्मचर्य पालन करो तो तुम जगत् का कल्याण कर सकोगे।'

दोनों में से उच्च कौन सा?

प्रश्नकर्ता : इतने-इतने से लड़के ब्रह्मचर्य में क्या समझ सकते हैं? ब्रह्मचर्य तो एक उम्र के बाद ही आ सकता है न?

दादाश्री : नहीं, ये लोग तो ब्रह्मचर्य के बारे में सही तौर पर समझ गए हैं! ऐसा है न, कि यह तो हमें ऐसा लगता है, लेकिन तेरह साल के बाद वह ब्रह्मचर्य के बारे में समझने लगता है। क्योंकि जब तेरह साल का होता है, तभी से इमोशनल हुए बिना रह ही नहीं सकता। फिर वह मोशन में नहीं रह सकता।

प्रश्नकर्ता : अब, दो तरह के ब्रह्मचर्य है। एक अपरिणित ब्रह्मचर्य दशा और दूसरा शादी करने के बाद पालन करे, वह। इनमें से उच्च कौन सा?

दादाश्री : शादी करके पालन करना उच्च कहलाता है। लेकिन शादी करके पालन करना मुश्किल है। अपने यहाँ कई शादी करके ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, लेकिन वे चालीस की उम्र से ज्यादावाले हैं।

प्रश्नकर्ता : तो फिर शादी किए बिना जो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, वह 'अनटेस्टेड' कहलाएगा न?

दादाश्री : नहीं। वह 'अनटेस्टेड' नहीं है। उसे खुद को ही शादी करने में रुचि नहीं होती। उसका कोई क्या कर सकता है? जिसे शादी करने में रुचि ही नहीं हो, उसके साथ हम जबरदस्ती कैसे कर सकते हैं? जबरदस्ती करनी चाहिए? मैं तो सभी से क्या कहता हूँ कि आप दो शादियाँ करो, आपको मोक्ष में दिक्कत नहीं आएगी। मेरे द्वारा जो ज्ञान दिया गया है, वह ज्ञान ही आपको मोक्ष में ले जाएगा, ऐसा है, लेकिन सिर्फ हमारी आज्ञा का पालन करना।

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शादी करना तो जोखिम ही है न! लेकिन अंतिम जन्म में आखिरी दस-पंद्रह साल तक अलग रहना पड़ता है, जबकि ये लोग पहले से ही रह रहे हैं, इसमें क्या गलत कर रहे हैं? पहले से अलग नहीं रह सकते, उनके लिए यह रास्ता है कि शादी करो। और क्या हो सकता है? और ऐसा नियम है ही नहीं कि शादी करनेवाले का मोक्ष नहीं हो सकता और अपरिणीत का ही मोक्ष होगा। बल्कि चारित्रवाले का मोक्ष होता है। शादी करनेवाले को भी अंत में दस-पंद्रह साल छोड़ना पड़ेगा। सभी से मुक्त होना पड़ेगा। महावीर स्वामी भी आखिरी बयालीस साल तक मुक्त रहे थे न! इस संसार में स्त्री के संग तो अनगिनत परेशानियाँ हैं। जोड़ी बनी कि परेशानियाँ बढ़ती हैं। दोनों के मन कैसे एक हो सकेंगे? कितनी बार मन एक रहेंगे? चलो, कड़ी दोनों को एक सी पसंद आई, लेकिन फिर सब्जी में क्या? वहाँ पर मन एक हो नहीं पाता और दिन बदलता नहीं। जहाँ मतभेद हो, वहाँ सुख नहीं होता।

जिनके विषय छूट गए, उनके मजे हैं! उस आनंद को भी वैसे ही लूटना होता है न! वह भी (अरे!) अपार आनंद!! वह आनंद तो, दुनिया ने चखा ही नहीं हो, वैसा आनंद उत्पन्न हो जाता है। पैंतीस साल का पीरियड निकाल देने के बाद अपार आनंद उत्पन्न होता है। जो विचारक हो, उसे तो विषय अच्छा ही नहीं लगेगा न? इन ब्रह्मचारियों का उदय आया है, वही धन्यभाग्य है न? सही तरीके से पार करना पड़ता है। पहले खुद पर श्रद्धा होनी चाहिए। बाकी विषय की जरूरत तो, जो सुखी हो उसे होती ही नहीं है। बहुत मानसिक मेहनतवाले को विषय की जरूरत है। जो बहुत मेहनत करते हों, उन्हें खूब जलन उत्पन्न होती है। वह सहन नहीं होती, इसलिए विषय में पड़ते हैं।

मैं इन सभी लड़कों को समझाता हूँ कि शादी के बाद फँसाव होगा। फिर आजकल के लड़के ऐसे हैं कि बीवी के सामने

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उनका जरा भी 'प्रभाव' नहीं पड़ता। जिसका प्रभाव पड़ता हो, वह तो अगर खुद कुछ भी नहीं बोले फिर भी बीवी को घबराहट हो जाती है। जबकि यहाँ तो बीवी का प्रभाव पड़ता है। लेकिन जिसके मन में ऐसे भाव हों कि मुझे शादी के बिना ही चलेगा ऐसा है, जिसका ऐसा स्ट्रोंग माइन्ड हो तब वह ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है। इसमें सतही तौर पर किया गया नहीं चलेगा। इस संसार में तो दुःख है, इसलिए मुझे शादी नहीं करनी है, भय के मारे ऐसा बोले तो वह नहीं चलेगा।

चारित्रबल से कांपती हैं स्त्रियाँ

अभी तो ये शादी के लिए क्यों मना करते हैं? भगेडू वृत्ति, भाग छूटो, वर्ना फँस जाएँगे!

प्रश्नकर्ता : ऐसा ही होना चाहिए न! विषय से संबंधित और इस संसार से संबंधित, स्त्री से संबंधित तो भगेडू वृत्ति ही होनी जरूरी है न?

दादाश्री : यानी कल यदि स्त्री हाथ से हाथ मिलाए तो क्या रो पड़ना चाहिए?

प्रश्नकर्ता : लेकिन कैसे भी बचकर भाग निकलने का रास्ता दूँढकर निकल जाना है, रास्ता दूँढकर भाग तो जाना चाहिए न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन हाथ पकड़ा तो क्या हो गया? बल्कि उसे डरना चाहिए हमसे। मतलब हाथ पकड़ने में उसे घबराहट हो, उसे डर लगे। यह तो इसे डर लगता है। 'अब क्या होगा, अब क्या होगा?' अरे क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : 'मुझे कुछ नहीं होगा।' ऐसे निडर तो नहीं हो सकते न, स्त्री हाथ पकड़े तो?

दादाश्री : उसमें तो चारित्रबल चाहिए। यों ऐसे नहीं चलेगा कि कोई हाथ पकड़े तो डर जाए। उसमें तो चारित्रबल चाहिए।

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देखते ही बेचारी को घबराहट हो जाए। वह स्त्री समझे कि अपने से कोई सवाया मिला।

प्रश्नकर्ता : तो उनमें चारित्रबल नहीं होता? इन भगेड़ू वृत्तिवालों में?

दादाश्री : कैसा चारित्रबल? चारित्र बलवाले होते होंगे? क्या वे ऐसे होते होंगे?

प्रश्नकर्ता : एक तरफ तो आप कहते हैं कि हाथ पकड़े, तब रोना नहीं है।

दादाश्री : कैसे रह सकता है? इन्हें तो अंदर डर लगता है, यों घबराहट हो जाती है।

प्रश्नकर्ता : एक तरफ चारित्रबल नहीं आया और दूसरी तरफ उनकी यह भगेड़ू वृत्ति है, तो क्या वह ठीक है?

दादाश्री : कौन मना कर रहा है? लेकिन यदि भगेड़ू वृत्ति के बिना हो न, तब खरा कहलाएगा।

प्रश्नकर्ता : तो इन भगेड़ू वृत्तिवाले को खुद को कैसे पता चलेगा कि चारित्रबल आ गया?

दादाश्री : हाथ पकड़े तब। आप अकेले हों और हाथ पकड़े तब घबराहट नहीं हो तो समझना कि चारित्रबल आ गया। यह तो घबराहट, घबराहट, घबराहट...

नहीं डालना चाहिए दबाव ब्रह्मचर्य के लिए...

ये सभी लड़के ब्रह्मचारी रहनेवाले हैं। मैंने इनसे कहा कि शादी कर लो। तब लड़के कहते हैं कि, 'नहीं, हमें ब्रह्मचारी रहना है।' अब, शादी के लिए हम उन पर दबाव भी नहीं डाल सकते क्योंकि उन्होंने पहले भावना की हुई है। दबाव डालना, वह भी गुनाह है और अगर कोई शादी कर रहा हो और उसे शादी के लिए मना करें तो वह भी गुनाह है।

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प्रश्नकर्ता : आपको ऐसा लगे कि इसे शादी करने की जरूरत है, तो क्या आप उसे वैसा कहेंगे?

दादाश्री : खुशी से। मैं तो उसे कहूँगा कि तू दो शादियाँ कर।

प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसे नहीं। आपको ज्ञानदृष्टि से दिखता है? आप ऐसा देख सकते हैं कि इसे शादी करने की जरूरत है?

दादाश्री : नहीं। ज्ञानदृष्टि से मैं कुछ नहीं देखता। मैं इसमें समय नहीं बिगाड़ता और ज्ञानदृष्टि इस तरह इस्तेमाल करने जैसी है भी नहीं। इसका मतलब क्या हुआ कि भविष्य देखने की आदत पड़ गई और जिसे भविष्य देखने की आदत पड़ जाए, वह तो साधु बाबा कहलाता है। फिर यहाँ भी लोग पूछने आएँगे कि मेरे बेटे के घर बेटा होगा या नहीं? अतः हम इस झंझट में नहीं पड़ते। मुझे तो लोग पूछने आते हैं तो मैं कह देता हूँ कि भविष्य के बारे में तो मैं जानता ही नहीं। कल मेरा क्या होगा? यह भी मैं नहीं जानता!

राजा-रानी का तलाक, शादी से पहले

एक भाई आया था, कह रहा था, 'मैं शादी नहीं करूँगा।' फिर दो-तीन साल ब्रह्मचर्य पालन किया। फिर एक दिन लड़की को लेकर आया। तब कहने लगा, 'दादाजी, आप ऐसी विधि कर दीजिए कि हम दोनों की शादी हो जाए।' 'अरे, ब्रह्मचर्य लेना था। यह क्या कर रहा है तू?' तब उन लोगों ने क्या कहा?

प्रश्नकर्ता : दादाजी के कहते ही उसी क्षण कहा, 'आप कहो तो आज से अलग।'

दादाश्री : 'अब आप फिर से हम दोनों की ब्रह्मचर्य की विधि कर दीजिए' कहते हैं। अरे, शादी का जोश चढ़ा था, वह

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उत्तर कैसे गया? कितने ही दिनों का जोश चढ़ा होगा! हम चाय पीने का सोचकर गए हों तो भी चाय का विचार एकदम बंद नहीं हो जाता जबकि वह तो कहने लगा, 'हमें ब्रह्मचर्य की विधि कर दीजिए।' दोनों खरे निकले। मैंने कहा, 'अब शादी नहीं करनी है? अरे, करो न! मुझे हर्ज नहीं है। मुझे क्या हर्ज हो सकता है?' तुम तो पहले मना कर रहे थे इसलिए तुम्हें सावधान किया कि, 'भाई, मना कर रहा था, अब फिर से व्यापार क्यों लगा रहा है?' लेकिन फिर भी हम एतराज नहीं उठाते। किसी की बेटी का भाग्य खिला हो बेचारी का, उसने पीपल पूजे हों। ऐसा पढ़ा-लिखा पति कहाँ से मिलेगा? कितने ही पीपल पूजे होंगे!

प्रश्नकर्ता : यहाँ पर तो छूटने का पूरा विज्ञान सीखना है और बाद में फिर से उस फँसाव में तो जाएँगे ही नहीं न! यहाँ पर तो ब्रह्मचर्य का पूरा परिचय प्राप्त करके, विषय से हमेशा के लिए मुक्ति मिले, ऐसी आराधना करनी है।

दादाश्री : लोग यह सब समझ गए हैं। बहुत पक्के हो गए हैं, हं! मैं तो सिकके को जाँचकर देख लेता हूँ, कच्चे हैं या नहीं? नहीं निकलते कच्चे। यह भी कच्चा नहीं पड़ता। 'कच्चा है', ऐसा पता चले तो तुरंत यहाँ किसी जैन की बेटी हो तो शादी करवा देंगे।

प्रश्नकर्ता : यहाँ तो विषय का तो है ही, उस ओर तो जाने जैसा है ही नहीं। लेकिन मोक्षमार्ग में बाधक अन्य कोई दोष हुए हों, गलती से भी उन दोषों में स्लिप न हो जायें, ऐसा सब मजबूत कर लेना है।

दादाश्री : वहाँ पर तो दोष चलेंगे ही नहीं न! अंधेर राज थोड़े ही है? आप जैसे बड़ी उम्रवालों की सेफ साइड हो गई क्योंकि आपको परेशान करनेवाला कोई रहा नहीं न! इन्हें तो अभी कितने ही जोखिम आएँगे।

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प्रश्नकर्ता : वह तो पता नहीं है, लेकिन इसमें रहना है। इस ज्ञान में, आज्ञा में, इस साइन्स में ही रहने जैसा है।

दादाश्री : तो रह पाओगे।

प्रश्नकर्ता : वे कैसे-कैसे जोखिम आते हैं?

दादाश्री : उनका दस मील का रास्ता बाकी रहा। आपके सात सौ मील बाकी है। कितने ठग मिलेंगे, कितने फँसानेवाले मिलेंगे!

प्रश्नकर्ता : तो उसमें सेफसाइड का रास्ता कैसे निकालें? क्या उसमें जोखिम सामने आते हैं?

दादाश्री : वह तो अगर इस सत्संग में पड़ा रहेगा तो चलेगा, कुसंग में नहीं जाए तो चलेगा।

प्रश्नकर्ता : एक ही उपाय है।

दादाश्री : यही बातें मिलती रहें, जहाँ जाओ वहाँ। कुसंग की बात ही नहीं आए तो तुरंत छुटकारा हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : यही सबसे बड़ा उपाय है। सत्संग का ही अनुसंधान, पूरी तरह से!

दादाश्री : सत्संग के संसर्ग में रहना पड़ेगा! झुंड में हों तब, वहाँ पर छूटना हो फिर भी नहीं छूट पाएँगे।

व्रत की विधि से, टूटते हैं अंतराय

इस लड़के को ब्रह्मचर्य के भाव हैं। यह भाव तो गलत नहीं है न? ऐसे भाववाले को हमें क्या करना चाहिए? हमें उन्हें आधार देना चाहिए या आधार ले लेना चाहिए?

प्रश्नकर्ता : आधार देना चाहिए।

दादाश्री : कोई ऐसे भाव कर रहा हो, फिर भले ही

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कुछ भी करे, फिर भी हम उसे आधार देने के लिए तैयार हैं क्योंकि हमारी इच्छा ही ऐसी है। अब आप ऐसे भाव करोगे तो आपको सभी संयोग भी वैसे ही मिलेंगे। हम तो बार-बार इन लड़कों का टेस्ट लेते रहते हैं। उन्हें लालच देते हैं कि ‘कर ले न शादी अब, छोड़ न, शादी करने में तो बहुत मजा है।’ उनका टेस्ट लेता हूँ कि उनका कच्चा है या पक्का है!

यह ब्रह्मचर्य व्रत किसी को नहीं दे सकते। यह तो हम एकाध साल के लिए या दो साल के लिए ही देते हैं। हमेशा के लिए देने के लिए तो मुझे कितनी सारी परीक्षा लेनी पड़ती है! हमारा वचनबल ब्रह्मचर्य पालन करवाए ऐसा है, सभी अंतराय तोड़ देता है, तेरी इच्छा होनी चाहिए। तेरी इच्छा प्रतिज्ञा में परिणमित होनी चाहिए। हाँ, बाद में यदि तुझे कोई अंतराय आएगा तो वह हमारा वचनबल तोड़ देगा। कोई एक बड़ा पानी का नाला हो और कोई उसे पार नहीं कर सक रहा हो तो उसके पीछे जाकर मैं उसे कहता हूँ कि, ‘कूद जा’ तो फिर वह कूद जाता है। यों खुद कूद सके, ऐसी शक्ति नहीं हो फिर भी कूद जाता है क्योंकि इस शब्द से उसे शक्ति प्राप्त होती है। उसी तरह अभी इन लड़कों को ब्रह्मचर्य लेना है, उन सब में हम शक्ति डालते हैं, उससे शक्तिपात होता है लेकिन यह शक्तिपात अलग प्रकार का है। जगत् में जो शक्तिपात होते हैं, वे सब भौतिक हैं। वास्तव में शक्तिपात जैसी कोई चीज़ है ही नहीं। यह तो सामनेवाले को ऐसा लगता है कि मुझे शक्ति प्राप्त हो गई। यह सब नियम से ही है। कोई किसी को देता नहीं और कुछ नहीं देता। यह तो खुद की ही शक्ति अनावृत होती है। ज्ञानी के बोलने से शक्ति अनावृत हो जाती है इसलिए खुद के मन में ऐसा लगता है कि मेरे अंदर कुछ डाला। ये सभी निर्बल ही थे न! ये अभी कितने आनंद में हैं, मानो दादाने शक्ति भर दी!

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साधना, 'संयमी' के संग

प्रश्नकर्ता : इन सभी संयमी लोगों को साथ रहना हो, तब तो वह और कहीं जाएगा ही नहीं।

दादाश्री : हाँ, ऐसा भी हो जाएगा लेकिन तब तक संभालने की जरूरत है। अभी संभाल कच्ची है, इसीलिए वैसा नहीं हो रहा है न? बिना संभाल के तो वहाँ पर सब गलत कहलाएगा। मार खाए बिना वहाँ जाएगा तो गड़बड़ हो जाएगी। खूब मार खाई हो, अच्छी तरह से गढ़ चुका हो, उसके बाद वहाँ जाए तो दिक्कत नहीं आएगी।

इन लड़कों को हम जो यह ब्रह्मचर्य संबंधित ज्ञान देते हैं ताकि अभी से उनकी लाइफ बिगड़ न जाए और यदि बिगड़ी हुई हो तो उसे कैसे सुधारे और सुधरी हुई फिर से नहीं बिगड़े और उसकी कैसे रक्षा करे, उतना हम उन्हें सिखाते हैं।

हम तो सभी से कहते हैं कि शादी कर लो। बाकी शादी करना या नहीं करना, वह उनके हाथ की बात नहीं है या मेरे हाथ की बात नहीं है या आपके हाथ की बात नहीं है। इन्होंने तो ब्रह्मचर्य को पकड़ लिया है, तो क्या उनके हाथ में यह सत्ता है? कल सुबह यदि फिर से मन बदल जाए तो शादी कर ले, भले ही कुछ भी कर ले, फिर भी 'व्यवस्थित' के आगे कोई कुछ नहीं कर सका है। फिर भी अभी जो इच्छा हो रही है न, उसमें किसी को देखादेखी से इच्छा होती है और किसी को सच्ची इच्छा भी हो सकती है लेकिन 'व्यवस्थित' जो करता है, उसके लिए फिर कोई उपाय ही नहीं है न? इसलिए हम किसी की जिम्मेदारी नहीं लेते। हम किसी की जिम्मेदारी लेते ही नहीं। हम तो उन्हें मार्ग दिखाते हैं। जिस रास्ते पर चलना हो, वह मार्ग देते हैं। बाकी, हम वचनबल देते हैं लेकिन अगर अंदर उसी का ठिकाना नहीं हो तो उसके लिए हम क्या कर सकते हैं? इस वाणी के तो हम मालिक नहीं है, इस रिकॉर्ड में जो माल था

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उतनी ही वाणी निकलती है। उसमें हमें कुछ लेनादेना नहीं है और इसमें हमें कुछ पड़ी भी नहीं है।

हम तो ऐसा भी नहीं कह सकते कि, 'भाई, तू शादी मत करना।' ऐसा दबाव नहीं डाल सकते। हम इतना कहते हैं कि 'तू शादी कर ले।' क्योंकि वह क्या माल भरकर लाया है, उसे वह खुद जानता है। उसे अंदर इस ओर का आकर्षण रहा करता है क्योंकि 'कर्मिंग इवेंट्स कास्ट देयर शैडोज बिफोर।' इसलिए खुद को पता चल जाता है कि 'उसके शैडोज क्या है?' इसलिए हम कोई दबाव नहीं डालते।

अब इसमें परेशानी कहाँ आती है कि इसमें अगर नकलें होने लेंगे तो। उसमें उनसे कहता हूँ कि 'नकल करोगे तो मार खाओगे, इसमें नकल मत करना।' इसलिए मैं इन्हें सावधान करता रहता हूँ कि, 'भाई, यदि इसमें नकल करोगे तो हम छूएँगे नहीं, हम एक्सेप्ट भी नहीं करेंगे, असली को एक्सेप्ट करेंगे।' नकली होगा तो फिर जिम्मेदारी उसकी। हमें तो असली लगे तभी कुछ जिम्मेदारी लेते हैं। लेकिन हमें जरूरत ही कहाँ है? हम तो मोक्ष का मार्ग दिखाने आए हैं। हमने उसे आत्मज्ञान दिया और कहा, 'आज्ञा पालन करना।' हमारी जिम्मेदारी का वहाँ पर एन्ड आ जाता है।

प्रश्नकर्ता : वह नकल कर रहा है या असल है, वह कैसे परख सकते हैं? वह खुद नहीं परख सकता, तभी तो आपसे कहते हैं कि हमारी परख कर दीजिए।

दादाश्री : मैं कहाँ उसमें हाथ डालूँ? हम हाथ नहीं डाल सकते। हमें तो अन्य कई तरह के उपयोग रखने पड़ते हैं। हमारे तो इतने सारे अन्य उपयोग होते हैं कि अगर ऐसी बातों में मैं उपयोग रखने जाऊँ तो इसका अंत ही नहीं आएगा न! हम तो, उसका अहित नहीं हो, अंत तक उसके पीछे हमारी वैसी हेल्प रहती ही है। हमारा तो चारों ओर से रक्षण रहता ही है।

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उसने अगर अंदर ऐसा माल भरा हुआ हो तो मैं उससे ऐसे भी नहीं कह सकता कि तू शादी कर। उससे दोनों का बिगड़ेगा। दोनों का नहीं, घर के सभी लोगों का बिगड़ेगा। हमें तो एट-ए-टाइम सभी तरह के विचार आते हैं न! वर्ना मेरे लिए इन सबका कब अंत आएगा? मुझे तो आपको मोक्ष में ले जाने का रास्ता दिखाना है। हम तो दूसरी ओर से हेल्य करने के लिए भी तैयार हैं। जब असल में वैसा हो जाएगा, तब मुझे पता चल जाएगा। दो-पाँच साल बाद उसका भी पता चल जाएगा न? अभी तो ‘ऑन ट्रायल’ रखा हुआ है। हाँ, असली हो जाएगा तब मुझे पता चल जाएगा। मुझे तो, कोई जरा भी अंदर कच्चा पड़ जाए तो पता चल जाता है और जगत् क्या छोड़ देगा? खुद की प्रकृति क्या छोड़ देगी? इसलिए हम ऑन ट्रायल देखते हैं।

अक्रम में ऐसे आश्रम की जरूरत

बाकी जिसे ब्रह्मचर्य व्रत लेना ही है तो उसे अब्रह्मचारी के साथ नहीं रहना चाहिए। वह ‘टच’ नहीं रहना चाहिए। उन्हें उनके जैसे ब्रह्मचारी के ही टच में रहना चाहिए। इसलिए उनकी यह बात तो सही ही है न, कि सब साथ में मिलकर रहे?

प्रश्नकर्ता : लेकिन अब्रह्मचारियों के साथ ही रहकर जब ब्रह्मचर्य व्रत पालन करे, तभी खरा है न? वही उसका टेस्ट है न?

दादाश्री : नहीं। हम वैसा नहीं कह सकते और वैसा नियम भी नहीं है। प्रकृति का नियम मना करता है। इतना टेस्टेड ईसान, वह तो फिर भगवान ही कहलाएगा न?

प्रश्नकर्ता : इनका तो पूरा समूह इकट्ठा हो जाएगा।

दादाश्री : यों ही कुछ होता है? इसके पीछे ‘व्यवस्थित’ है। ‘व्यवस्थित’ का नियम तो है न? यह ‘व्यवस्थित’ कैसा है कि जो रोज यहाँ ब्रह्मचर्य का कार्य कर रहा हो और तीन दिनों

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में 'व्यवस्थित' ऐसा भी आ जाए कि शादी कर ले। अतः यह 'व्यवस्थित' छोड़ता नहीं है। मेरे पास चारों ओर का हिसाब है। इसलिए ऐसा कोई डर मत रखना। 'व्यवस्थित' पर छोड़ दो न! 'व्यवस्थित' से बाहर कुछ भी नहीं होनेवाला, इतना तो तुम्हें भरोसा है न? 'व्यवस्थित' पर थोड़ा बहुत तो भरोसा हुआ है न?

प्रश्नकर्ता : पूरी तरह से।

दादाश्री : अपने मार्ग में आश्रम जैसी किसी चीज़ की ज़रूरत ही नहीं है। लेकिन क्योंकि ये ब्रह्मचारी बने हैं, इसलिए इन्हें ज़रूरत है। बाकी अपने ज्ञान में तो भवन की भी ज़रूरत नहीं और किसी की भी ज़रूरत नहीं है। जहाँ हो, वहाँ पर सत्संग कर लें और न हो तो बाहर बगीचे में पेड़ के नीचे सत्संग कर लें। लेकिन ये तो ब्रह्मचर्य पालन करनेवाले बने, इसलिए यह प्रश्न हुआ कि, 'ब्रह्मचर्य पालन करना', घर में रहकर कोई उसका पालन नहीं कर सकता। वह तो ब्रह्मचारियों का गुट अलग ही होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : उन्हें वातावरण की ज़रूरत है?

दादाश्री : हाँ, वातावरण की ही ज़रूरत है। वातावरण से ही ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकता है और अब्रह्मचर्य का मुख्य कारण भी वातावरण ही है। बाकी आत्मा वैसा नहीं है, यह तो सब वातावरण का असर है। इसलिए ब्रह्मचर्य साइकोलॉजिकल इफेक्ट है और अब्रह्मचर्य भी साइकोलॉजिकल इफेक्ट है लेकिन अब्रह्मचर्य का साइकोलॉजिकल इफेक्ट बहुत काल से गाढ़ हो गया है, इसलिए उसे पता नहीं चलता कि यह साइकोलॉजिकल इफेक्ट है।

ब्रह्मचर्य के बिना नहीं जा सकते मोक्ष में कभी

आज से चालीस साल पहले, मुझे एक अविवाहित ईंसान मिले थे, उन्हें कोई औरत नहीं मिली थी। पहले ऐसा जमाना था कि अविवाहित भी मिलते थे। तो मैंने उनसे पूछा कि, 'विषय में सुख है क्या?' तब कहने लगे कि, 'उसके जैसा सुख कहीं

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है ही नहीं' अरे तेरी औरत नहीं है, फिर क्यों तू इसमें सुख मानकर बैठा है? कभी अगर खाना मिला हो तो उसमें उसका अभिप्राय रहा करता है, उसके बजाय अगर वह अभिप्राय बदल जाए तो हर्ज नहीं है। उस अभिप्राय का रहना, वह भयंकर गुनाह है। यह विषय तो सबसे खराब चीज है, ऐसा निरंतर अभिप्राय रहेगा तो आपका आज का गुनाह थोड़ा-बहुत चौदह आने जितना माफ हो जाएगा। लेकिन जिसे ऐसा अभिप्राय बरतता है, कि विषय में कोई हर्ज नहीं है तो वह बेचारा तो मारा ही गया! क्यों मारा जाएगा कि अभी भी उसे अभिप्राय है कि इसमें कोई हर्ज नहीं है।

ये ब्रह्मचारी लड़के मुझसे कह जाते हैं कि अभी भी हमें तो अंदर ऐसे खराब विचार आते हैं और ऐसा सब होता है। तब मैंने कहा कि इसके लिए प्रतिक्रमण करना, लेकिन इसके लिए बहुत परेशान मत होना क्योंकि भगवान तो क्या कहते हैं कि अभिप्राय अब्रह्मचर्य का है या ब्रह्मचर्य का? ब्रह्मचर्य पालन करना अच्छा है या नहीं? तब जो लोग ऐसा कहते हैं कि 'ब्रह्मचर्य तो हमसे नहीं हो सकेगा,' तो उन्हें एक ओर बिठा देते हैं और जो कहते हैं कि 'हमें अब्रह्मचर्य बिल्कुल भी नहीं चलेगा।' उन्हें दूसरी ओर बिठा देते हैं। इस तरह दो ही विभाग करते हैं। तुम्हें ब्रह्मचर्य का अभिप्राय रहता है इसलिए तुम ब्रह्मचर्य विभाग में बैठ गए।

अब तुम्हें सभी संसारी विचार आएँ तब भगवान क्या कहते हैं कि 'तुम्हें क्या पसंद है?' तब कहते हैं कि 'ब्रह्मचर्य।' इसलिए अब तुम ब्रह्मचर्य विभाग में बैठे हो लेकिन बाद में ब्रह्मचर्य का अभिप्राय बदल नहीं जाना चाहिए। यानी ब्रह्मचर्य के विरुद्ध होने के विचार आएँ, वहाँ तक मत पहुँचना। यानी कि उन विचारों पर कंट्रोल रखना। अतः मुख्यतः तो तुम्हारा अभिप्राय नहीं बदलना चाहिए। मैं क्या कहना चाहता हूँ, वह तुम्हारी समझ में आया न?

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प्रश्नकर्ता : हाँ। उगता और ढलता, ये दो भेद पड़ जाने के बाद कोई दिक्कत नहीं। उसके बाद विचारों का संपर्क नहीं होगा।

दादाश्री : अब ऐसा कोई सिखाता ही नहीं है न! मैं यह महत्वपूर्ण बात बता रहा हूँ। इसमें संपर्कण नहीं होगा और काम हो जाएगा।

मन बिगड़े तब

प्रश्नकर्ता : आपका 'ज्ञान' लेने के बाद ब्रह्मचर्य लें तो अच्छा है न?

दादाश्री : ये सभी लड़के यहाँ बैठे रहते हैं, ये 'स्वरूप ज्ञान' में भी हैं और ब्रह्मचर्य में भी हैं। हर तरह से उन्हें सुख रहता है। 'ज्ञान' के साथ ब्रह्मचर्य हो, उसकी तो बात ही अलग है न! अतः ब्रह्मचर्य कैसा होना चाहिए? मन-वचन-काया से होना चाहिए। मन में विषय से संबंधित विचार तक नहीं आना चाहिए और जरा सा भी विचार आए तो तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लेते हैं। ये सभी लड़के मन-वचन-काया से संपूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करते हैं। विचार तो आते ही हैं इंसान को। जो विचार आते हैं, वे डिस्चार्ज हो रहे हैं। अतः खुद की इच्छा के विरुद्ध आते हैं, लेकिन विचार से जो दाग लगे उन्हें, हमने जो साबुन दिया है उससे धो देते हैं।

प्रश्नकर्ता : बार-बार दाग धोएँगे तो कपड़ा फट जाएगा न?

दादाश्री : नहीं, हमारा साबुन ही ऐसा होता है कि कपड़ा फट नहीं जाता। दोष होते ही 'शूट ऑन साइट' हो जाता है!

प्रश्नकर्ता : कई लोग ब्रह्मचर्य व्रत की आज्ञा लेते हैं, लेकिन मन बिगड़ता रहे तो उसका कोई अर्थ ही नहीं न?

दादाश्री : मन बिगड़ा कि सबकुछ बिगड़ा। फिर भी ये

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सभी बहुत अच्छा कर रहे हैं। आज्ञा का जितना पालन किया, उतना तो मन बिगड़ना रुक गया! यह ज्ञान ऐसा है कि इससे सूक्ष्म ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है क्योंकि मन सुख खोजता है न? यह ज्ञान सुखवाला है, इसलिए ये सब लड़के मजे करते हैं न? इन्हें क्या होता है कि जवानी है और भोजन खाते हैं, उस भोजन का असर होता है या नहीं? जिसने शादी की हो और उसे 'इफेक्ट' हो तो उसमें हर्ज नहीं है। लेकिन जिसने शादी नहीं की है उसका क्या होगा? इसलिए ये लोग डरते-डरते खाते हैं। क्या कहते हैं कि हमें 'डिस्चार्ज' हो जाता है। अरे, भले ही 'डिस्चार्ज' हो जाए। यह तो अंदर असर हो जाता है कि डिस्चार्ज हो गया लेकिन तूने नहीं किया न? खुद को नहीं करना चाहिए। इसलिए मैंने कहा वह बुद्धिपूर्वक नहीं है इसलिए हर्ज नहीं है। बुद्धिपूर्वक हो तो हर्ज है।

प्रश्नकर्ता : बुद्धिपूर्वक यानी कैसा?

दादाश्री : बुद्धिपूर्वक का मतलब खुद इच्छापूर्वक करे, वैसा। जबकि यह तो रात में सपने में हो जाता है। 'उसके लिए तुम गुनहगार हो ही नहीं,' ऐसा उन्हें कह दिया वनां परेशान होते रहेंगे, बिना वजह। तेरी इच्छा नहीं है न? वैसा नहीं करना चाहिए। अब अगर वह हो जाता है, तो उसमें हर्ज नहीं। तेरा बुद्धिपूर्वक नहीं है न? तब कहते हैं 'नहीं'। और सपना, वह तो दुनिया ही अलग है। वह बात अलग ही दुनिया की है।

सपने के भोग का पूर्वापर संबंध?

प्रश्नकर्ता : नींद में जो अटपटे भोग भासित होते हैं, उनमें कुछ सत्यता है?

दादाश्री : है न! पिछले जन्म में भोगा था, उसके संस्कार दिखाई देते हैं अभी। पिछले जन्म में, अनंत जन्म में जो भोग भोगे हों न, वे सभी संस्कार आज सपने में दिखाई देते हैं।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : लेकिन यह तो पूर्वापर संबंध के बिना दिखता है न?

दादाश्री : पूर्वापर संबंध है ही।

प्रश्नकर्ता : नहीं, नहीं, दिन भर में या फिर जिंदगीभर में कुछ नहीं किया हो तो वह पूर्वापर संबंध के बिना इस सपने में हो सकता है?

दादाश्री : हाँ, आज के संबंध के बिना हो सकता है। लेकिन उस संस्कार का उदय आया कि तुरंत दिखाई देता है। कोई साधु हो फिर भी उन्हें सपने में रनिवास आता है। अरे, त्याग किया, बीवी को छोड़ा, फिर भी रानी के सपने आते हैं? क्योंकि जो पहले के संस्कार हैं, वही आते हैं।

प्रश्नकर्ता : क्या ऐसा नहीं है कि इस जन्म की अतुप्त वासना से वे सपने आते हैं?

दादाश्री : नहीं, नहीं। अगर इस जन्म की अतुप्त वासना हो न तो वह जहाँ-तहाँ मुँह मारता रहेगा। जो भूखा इंसान होता है न, वह जहाँ कहीं भी हलवाई की दुकान दिखाई दे, तो वहीं ताकता रहता है। मतलब अगर हलवाई की दुकान की ओर ताकता रहे तो लोग समझ जाते हैं कि यह भूखा है। इंसान इन सारी औरतों को देखे या गायों-भैंसों को देखे और वहाँ पर भी ताकता रहे तो क्या हम नहीं समझ जाएँगे कि इसे कुछ अतुप्त वासनाएँ हैं?

प्रश्नकर्ता : लेकिन उसकी वृत्तियों को हम कैसे बंद कर सकते हैं?

दादाश्री : उसमें तो हमसे कुछ नहीं हो सकेगा। वह तो जब खुद सीधा होगा तभी हो सकेगा।

प्रश्नकर्ता : तो उसकी वृत्तियाँ निकालने का रास्ता क्या है? सत्संग?

अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक (खंड-2-१७)

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दादाश्री : सत्संग के अलावा तो और कोई उपाय नहीं है। कुसंग से ही ये सारी वृतियाँ ऐसी हो जाती हैं, और दूसरा, विषयों में यदि कभी तरछोड़ (तिरस्कार सहित दुत्कारना) मिली हो न, तब तो उसे पूरे दिन विषय के ही विचार आते रहते हैं। इसलिए हमने कहा है न, कि एक से शादी करना ताकि वृतियाँ शांत हो जाएँ। बाकी तरछोड़ खाया हुआ इंसान तो सभी ओर ताकता रहता है। वह मनुष्य की स्त्री को तो देखता ही है लेकिन तिर्यच की स्त्री को भी देखता है, और निरीक्षण भी करता है।

प्रश्नकर्ता : उपवास करने से तो उसकी वृतियाँ हमेशा संयम में रहेंगी, इस बात में कोई सच्चाई है?

दादाश्री : हाँ, रहती है लेकिन वह तो उसके संयम पर आधारित है, उसके संस्कार पर आधारित है।

प्रश्नकर्ता : संस्कार तो गढ़ना पड़ेगा न, क्योंकि अगर पिछले जन्म का कुछ भी लेकर नहीं आया हो तो?

दादाश्री : नहीं अगर वह संयम लेकर आया होगा न, तो जब वह उपवास करे, तब आप उसे जलेबी वगैरह दिखाओ, फिर भी उसका चित्त उनमें नहीं जाएगा, ऐसे भी लोग हैं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन ऐसे पूर्व के उदय तो महान पुरुष ही लेकर आते हैं, लेकिन सामान्य लोगों के लिए कुछ नहीं हो सकता?

दादाश्री : सामान्य लोगों की तो बिसात ही नहीं न! सामान्य लोगों की क्या बिसात?

प्रश्नकर्ता : तो सत्संग से उसमें कुछ जागृति आएगी?

दादाश्री : हाँ, सत्संग में आए, रोज पढ़ा रहे इस सत्संग में, तब उसका पूरा होगा। उसका उपाय ही सत्संग, सत्संग और सत्संग है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादावाणी निकली ब्रह्मचारियों के लिए

बाकी विषय तो भयंकर दुःख और यातनाएँ ही हैं सिर्फ! फिर, जो चित्त है, वह पूरे दिन भटक, भटक, भटक करता रहता है। कमजोर पड़ जाता है, ढीला पड़ जाता है। तेरा ऐसे ढीला पड़ जाता है क्या?

प्रश्नकर्ता : कभी कभार ऐसा हो जाता है।

दादाश्री : कभी कभार होता है न? लेकिन पूरे दिन, हमेशा के लिए तो नहीं न? तो काम हो गया। जिसने नियम ही लिया है कि मुझे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना ही है, तो उसमें अगर लीकेज होने पर भी भगवान उसे लेट गो करते हैं। कुदरत का न्याय लेट गो करता है और अगर सभी ब्रह्मचारी एक साथ रहें तो ब्रह्मचर्य टिक सकता है। वनाँ अगर यहाँ शहर में अकेला रहे तो उसका ब्रह्मचर्य टिकेगा ही नहीं न।

प्रश्नकर्ता : लेकिन खरा तो वही कहलाएगा न?

दादाश्री : वह खरा तो कहलाएगा लेकिन इतना टेस्टेड तो इस काल में कोई है नहीं न! वैसा टेस्टिंग तो ज्ञानीपुरुष के अलावा अन्य कोई नहीं दे सकता। ज्ञानीपुरुष को तो ‘ओपन टु स्काय’ ही होता है। रात में कभी भी उनके वहाँ जाओ, फिर भी ओपन टु स्काय होते हैं। हमें तो ब्रह्मचर्य पालन करना पड़े ऐसा भी नहीं होता। हमें तो विषय याद ही नहीं आता। इस शरीर में वह परमाणु ही नहीं हैं न। तभी तो ब्रह्मचर्य संबंधित ऐसी वाणी निकलती है न! विषय के सामने तो कोई बोला ही नहीं है। लोग विषयी हैं, इसलिए लोगों ने विषय पर उपदेश ही नहीं दिया, और अपने यहाँ तो ब्रह्मचर्य पर इतना कहा है कि पूरी किताब बन सके, और ठेठ तक की बात कही हैं क्योंकि हम में तो वे परमाणु ही खत्म हो चुके हैं, हम देह से बाहर रहते हैं। बाहर यानी निरंतर पड़ोसी की तरह रहते

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हैं! वर्ना ऐसा आश्चर्य मिल ही नहीं सकता न कभी भी!

ब्रह्मचर्य का एक और अब्रह्मचर्य के अनेक दुःख

प्रश्नकर्ता : लेकिन यह ब्रह्मचर्य, वह कुछ खाने के खेल नहीं हैं।

दादाश्री : ब्रह्मचर्य कुछ खाने के खेल नहीं हैं, तो अब्रह्मचर्य भी खाने के खेल नहीं हैं। अब्रह्मचर्य की जो पीड़ा है न, ब्रह्मचर्य में उसके बजाय बहुत कम पीड़ा है। ब्रह्मचर्य में एक ही प्रकार की पीड़ा है कि विषय की ओर ध्यान ही नहीं देना है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन इस पीड़ा से सुख तो बहुत उत्पन्न होता है। यदि इतना संभाल लिया कि उस ओर ध्यान ही न दे, तो पीड़ा के बजाय अंदर सुख उत्पन्न होगा।

दादाश्री : उसमें तो स्वभाविक रूप से सुख ही उत्पन्न होगा लेकिन उस पर ध्यान नहीं देने के लिए विषय का विचार आने से पहले ही उखाड़ दे और प्रतिक्रमण करके पूरा एक्जेक्टनेस में रहना पड़ता है। खेत में बीज पड़ने ही नहीं देंगे तो उगेगा ही कैसे? तेरा अंदर ठीक रहता है या बिगड़ गया है? पूरा ही बिगड़ गया है? थोड़ा-थोड़ा? तो अब कुछ सुधार कर ले! विषय के ये दुःख तो तुझसे सहन नहीं होंगे। यह तो मोटी खालवाले लोग हैं कि जो सहन कर सकते हैं, वे यातनाएँ। बाकी तू तो पतली खालवाला है, तो कैसे वे यातनाएँ सहन कर सकेगा?

प्रश्नकर्ता : लेकिन यदि बीज डल जाए और पेड़ बन जाए तो क्या करेगा? फिर फल खाना ही पड़ेगा न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन यह तो उन से कह रहा हूँ जो सावधान हो चुके हैं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन जो लोग संसार में हैं, उसे बीज पड़ गया और पेड़ बन गया तो?