भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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में 'व्यवस्थित' ऐसा भी आ जाए कि शादी कर ले। अतः यह 'व्यवस्थित' छोड़ता नहीं है। मेरे पास चारों ओर का हिसाब है। इसलिए ऐसा कोई डर मत रखना। 'व्यवस्थित' पर छोड़ दो न! 'व्यवस्थित' से बाहर कुछ भी नहीं होनेवाला, इतना तो तुम्हें भरोसा है न? 'व्यवस्थित' पर थोड़ा बहुत तो भरोसा हुआ है न?

प्रश्नकर्ता : पूरी तरह से।

दादाश्री : अपने मार्ग में आश्रम जैसी किसी चीज़ की ज़रूरत ही नहीं है। लेकिन क्योंकि ये ब्रह्मचारी बने हैं, इसलिए इन्हें ज़रूरत है। बाकी अपने ज्ञान में तो भवन की भी ज़रूरत नहीं और किसी की भी ज़रूरत नहीं है। जहाँ हो, वहाँ पर सत्संग कर लें और न हो तो बाहर बगीचे में पेड़ के नीचे सत्संग कर लें। लेकिन ये तो ब्रह्मचर्य पालन करनेवाले बने, इसलिए यह प्रश्न हुआ कि, 'ब्रह्मचर्य पालन करना', घर में रहकर कोई उसका पालन नहीं कर सकता। वह तो ब्रह्मचारियों का गुट अलग ही होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : उन्हें वातावरण की ज़रूरत है?

दादाश्री : हाँ, वातावरण की ही ज़रूरत है। वातावरण से ही ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकता है और अब्रह्मचर्य का मुख्य कारण भी वातावरण ही है। बाकी आत्मा वैसा नहीं है, यह तो सब वातावरण का असर है। इसलिए ब्रह्मचर्य साइकोलॉजिकल इफेक्ट है और अब्रह्मचर्य भी साइकोलॉजिकल इफेक्ट है लेकिन अब्रह्मचर्य का साइकोलॉजिकल इफेक्ट बहुत काल से गाढ़ हो गया है, इसलिए उसे पता नहीं चलता कि यह साइकोलॉजिकल इफेक्ट है।

ब्रह्मचर्य के बिना नहीं जा सकते मोक्ष में कभी

आज से चालीस साल पहले, मुझे एक अविवाहित ईंसान मिले थे, उन्हें कोई औरत नहीं मिली थी। पहले ऐसा जमाना था कि अविवाहित भी मिलते थे। तो मैंने उनसे पूछा कि, 'विषय में सुख है क्या?' तब कहने लगे कि, 'उसके जैसा सुख कहीं

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है ही नहीं' अरे तेरी औरत नहीं है, फिर क्यों तू इसमें सुख मानकर बैठा है? कभी अगर खाना मिला हो तो उसमें उसका अभिप्राय रहा करता है, उसके बजाय अगर वह अभिप्राय बदल जाए तो हर्ज नहीं है। उस अभिप्राय का रहना, वह भयंकर गुनाह है। यह विषय तो सबसे खराब चीज है, ऐसा निरंतर अभिप्राय रहेगा तो आपका आज का गुनाह थोड़ा-बहुत चौदह आने जितना माफ हो जाएगा। लेकिन जिसे ऐसा अभिप्राय बरतता है, कि विषय में कोई हर्ज नहीं है तो वह बेचारा तो मारा ही गया! क्यों मारा जाएगा कि अभी भी उसे अभिप्राय है कि इसमें कोई हर्ज नहीं है।

ये ब्रह्मचारी लड़के मुझसे कह जाते हैं कि अभी भी हमें तो अंदर ऐसे खराब विचार आते हैं और ऐसा सब होता है। तब मैंने कहा कि इसके लिए प्रतिक्रमण करना, लेकिन इसके लिए बहुत परेशान मत होना क्योंकि भगवान तो क्या कहते हैं कि अभिप्राय अब्रह्मचर्य का है या ब्रह्मचर्य का? ब्रह्मचर्य पालन करना अच्छा है या नहीं? तब जो लोग ऐसा कहते हैं कि 'ब्रह्मचर्य तो हमसे नहीं हो सकेगा,' तो उन्हें एक ओर बिठा देते हैं और जो कहते हैं कि 'हमें अब्रह्मचर्य बिल्कुल भी नहीं चलेगा।' उन्हें दूसरी ओर बिठा देते हैं। इस तरह दो ही विभाग करते हैं। तुम्हें ब्रह्मचर्य का अभिप्राय रहता है इसलिए तुम ब्रह्मचर्य विभाग में बैठ गए।

अब तुम्हें सभी संसारी विचार आएँ तब भगवान क्या कहते हैं कि 'तुम्हें क्या पसंद है?' तब कहते हैं कि 'ब्रह्मचर्य।' इसलिए अब तुम ब्रह्मचर्य विभाग में बैठे हो लेकिन बाद में ब्रह्मचर्य का अभिप्राय बदल नहीं जाना चाहिए। यानी ब्रह्मचर्य के विरुद्ध होने के विचार आएँ, वहाँ तक मत पहुँचना। यानी कि उन विचारों पर कंट्रोल रखना। अतः मुख्यतः तो तुम्हारा अभिप्राय नहीं बदलना चाहिए। मैं क्या कहना चाहता हूँ, वह तुम्हारी समझ में आया न?

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प्रश्नकर्ता : हाँ। उगता और ढलता, ये दो भेद पड़ जाने के बाद कोई दिक्कत नहीं। उसके बाद विचारों का संपर्क नहीं होगा।

दादाश्री : अब ऐसा कोई सिखाता ही नहीं है न! मैं यह महत्वपूर्ण बात बता रहा हूँ। इसमें संपर्कण नहीं होगा और काम हो जाएगा।

मन बिगड़े तब

प्रश्नकर्ता : आपका 'ज्ञान' लेने के बाद ब्रह्मचर्य लें तो अच्छा है न?

दादाश्री : ये सभी लड़के यहाँ बैठे रहते हैं, ये 'स्वरूप ज्ञान' में भी हैं और ब्रह्मचर्य में भी हैं। हर तरह से उन्हें सुख रहता है। 'ज्ञान' के साथ ब्रह्मचर्य हो, उसकी तो बात ही अलग है न! अतः ब्रह्मचर्य कैसा होना चाहिए? मन-वचन-काया से होना चाहिए। मन में विषय से संबंधित विचार तक नहीं आना चाहिए और जरा सा भी विचार आए तो तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लेते हैं। ये सभी लड़के मन-वचन-काया से संपूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करते हैं। विचार तो आते ही हैं इंसान को। जो विचार आते हैं, वे डिस्चार्ज हो रहे हैं। अतः खुद की इच्छा के विरुद्ध आते हैं, लेकिन विचार से जो दाग लगे उन्हें, हमने जो साबुन दिया है उससे धो देते हैं।

प्रश्नकर्ता : बार-बार दाग धोएँगे तो कपड़ा फट जाएगा न?

दादाश्री : नहीं, हमारा साबुन ही ऐसा होता है कि कपड़ा फट नहीं जाता। दोष होते ही 'शूट ऑन साइट' हो जाता है!

प्रश्नकर्ता : कई लोग ब्रह्मचर्य व्रत की आज्ञा लेते हैं, लेकिन मन बिगड़ता रहे तो उसका कोई अर्थ ही नहीं न?

दादाश्री : मन बिगड़ा कि सबकुछ बिगड़ा। फिर भी ये

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सभी बहुत अच्छा कर रहे हैं। आज्ञा का जितना पालन किया, उतना तो मन बिगड़ना रुक गया! यह ज्ञान ऐसा है कि इससे सूक्ष्म ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है क्योंकि मन सुख खोजता है न? यह ज्ञान सुखवाला है, इसलिए ये सब लड़के मजे करते हैं न? इन्हें क्या होता है कि जवानी है और भोजन खाते हैं, उस भोजन का असर होता है या नहीं? जिसने शादी की हो और उसे 'इफेक्ट' हो तो उसमें हर्ज नहीं है। लेकिन जिसने शादी नहीं की है उसका क्या होगा? इसलिए ये लोग डरते-डरते खाते हैं। क्या कहते हैं कि हमें 'डिस्चार्ज' हो जाता है। अरे, भले ही 'डिस्चार्ज' हो जाए। यह तो अंदर असर हो जाता है कि डिस्चार्ज हो गया लेकिन तूने नहीं किया न? खुद को नहीं करना चाहिए। इसलिए मैंने कहा वह बुद्धिपूर्वक नहीं है इसलिए हर्ज नहीं है। बुद्धिपूर्वक हो तो हर्ज है।

प्रश्नकर्ता : बुद्धिपूर्वक यानी कैसा?

दादाश्री : बुद्धिपूर्वक का मतलब खुद इच्छापूर्वक करे, वैसा। जबकि यह तो रात में सपने में हो जाता है। 'उसके लिए तुम गुनहगार हो ही नहीं,' ऐसा उन्हें कह दिया वनां परेशान होते रहेंगे, बिना वजह। तेरी इच्छा नहीं है न? वैसा नहीं करना चाहिए। अब अगर वह हो जाता है, तो उसमें हर्ज नहीं। तेरा बुद्धिपूर्वक नहीं है न? तब कहते हैं 'नहीं'। और सपना, वह तो दुनिया ही अलग है। वह बात अलग ही दुनिया की है।

सपने के भोग का पूर्वापर संबंध?

प्रश्नकर्ता : नींद में जो अटपटे भोग भासित होते हैं, उनमें कुछ सत्यता है?

दादाश्री : है न! पिछले जन्म में भोगा था, उसके संस्कार दिखाई देते हैं अभी। पिछले जन्म में, अनंत जन्म में जो भोग भोगे हों न, वे सभी संस्कार आज सपने में दिखाई देते हैं।

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प्रश्नकर्ता : लेकिन यह तो पूर्वापर संबंध के बिना दिखता है न?

दादाश्री : पूर्वापर संबंध है ही।

प्रश्नकर्ता : नहीं, नहीं, दिन भर में या फिर जिंदगीभर में कुछ नहीं किया हो तो वह पूर्वापर संबंध के बिना इस सपने में हो सकता है?

दादाश्री : हाँ, आज के संबंध के बिना हो सकता है। लेकिन उस संस्कार का उदय आया कि तुरंत दिखाई देता है। कोई साधु हो फिर भी उन्हें सपने में रनिवास आता है। अरे, त्याग किया, बीवी को छोड़ा, फिर भी रानी के सपने आते हैं? क्योंकि जो पहले के संस्कार हैं, वही आते हैं।

प्रश्नकर्ता : क्या ऐसा नहीं है कि इस जन्म की अतुप्त वासना से वे सपने आते हैं?

दादाश्री : नहीं, नहीं। अगर इस जन्म की अतुप्त वासना हो न तो वह जहाँ-तहाँ मुँह मारता रहेगा। जो भूखा इंसान होता है न, वह जहाँ कहीं भी हलवाई की दुकान दिखाई दे, तो वहीं ताकता रहता है। मतलब अगर हलवाई की दुकान की ओर ताकता रहे तो लोग समझ जाते हैं कि यह भूखा है। इंसान इन सारी औरतों को देखे या गायों-भैंसों को देखे और वहाँ पर भी ताकता रहे तो क्या हम नहीं समझ जाएँगे कि इसे कुछ अतुप्त वासनाएँ हैं?

प्रश्नकर्ता : लेकिन उसकी वृत्तियों को हम कैसे बंद कर सकते हैं?

दादाश्री : उसमें तो हमसे कुछ नहीं हो सकेगा। वह तो जब खुद सीधा होगा तभी हो सकेगा।

प्रश्नकर्ता : तो उसकी वृत्तियाँ निकालने का रास्ता क्या है? सत्संग?

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दादाश्री : सत्संग के अलावा तो और कोई उपाय नहीं है। कुसंग से ही ये सारी वृतियाँ ऐसी हो जाती हैं, और दूसरा, विषयों में यदि कभी तरछोड़ (तिरस्कार सहित दुत्कारना) मिली हो न, तब तो उसे पूरे दिन विषय के ही विचार आते रहते हैं। इसलिए हमने कहा है न, कि एक से शादी करना ताकि वृतियाँ शांत हो जाएँ। बाकी तरछोड़ खाया हुआ इंसान तो सभी ओर ताकता रहता है। वह मनुष्य की स्त्री को तो देखता ही है लेकिन तिर्यच की स्त्री को भी देखता है, और निरीक्षण भी करता है।

प्रश्नकर्ता : उपवास करने से तो उसकी वृतियाँ हमेशा संयम में रहेंगी, इस बात में कोई सच्चाई है?

दादाश्री : हाँ, रहती है लेकिन वह तो उसके संयम पर आधारित है, उसके संस्कार पर आधारित है।

प्रश्नकर्ता : संस्कार तो गढ़ना पड़ेगा न, क्योंकि अगर पिछले जन्म का कुछ भी लेकर नहीं आया हो तो?

दादाश्री : नहीं अगर वह संयम लेकर आया होगा न, तो जब वह उपवास करे, तब आप उसे जलेबी वगैरह दिखाओ, फिर भी उसका चित्त उनमें नहीं जाएगा, ऐसे भी लोग हैं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन ऐसे पूर्व के उदय तो महान पुरुष ही लेकर आते हैं, लेकिन सामान्य लोगों के लिए कुछ नहीं हो सकता?

दादाश्री : सामान्य लोगों की तो बिसात ही नहीं न! सामान्य लोगों की क्या बिसात?

प्रश्नकर्ता : तो सत्संग से उसमें कुछ जागृति आएगी?

दादाश्री : हाँ, सत्संग में आए, रोज पढ़ा रहे इस सत्संग में, तब उसका पूरा होगा। उसका उपाय ही सत्संग, सत्संग और सत्संग है।

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दादावाणी निकली ब्रह्मचारियों के लिए

बाकी विषय तो भयंकर दुःख और यातनाएँ ही हैं सिर्फ! फिर, जो चित्त है, वह पूरे दिन भटक, भटक, भटक करता रहता है। कमजोर पड़ जाता है, ढीला पड़ जाता है। तेरा ऐसे ढीला पड़ जाता है क्या?

प्रश्नकर्ता : कभी कभार ऐसा हो जाता है।

दादाश्री : कभी कभार होता है न? लेकिन पूरे दिन, हमेशा के लिए तो नहीं न? तो काम हो गया। जिसने नियम ही लिया है कि मुझे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना ही है, तो उसमें अगर लीकेज होने पर भी भगवान उसे लेट गो करते हैं। कुदरत का न्याय लेट गो करता है और अगर सभी ब्रह्मचारी एक साथ रहें तो ब्रह्मचर्य टिक सकता है। वनाँ अगर यहाँ शहर में अकेला रहे तो उसका ब्रह्मचर्य टिकेगा ही नहीं न।

प्रश्नकर्ता : लेकिन खरा तो वही कहलाएगा न?

दादाश्री : वह खरा तो कहलाएगा लेकिन इतना टेस्टेड तो इस काल में कोई है नहीं न! वैसा टेस्टिंग तो ज्ञानीपुरुष के अलावा अन्य कोई नहीं दे सकता। ज्ञानीपुरुष को तो ‘ओपन टु स्काय’ ही होता है। रात में कभी भी उनके वहाँ जाओ, फिर भी ओपन टु स्काय होते हैं। हमें तो ब्रह्मचर्य पालन करना पड़े ऐसा भी नहीं होता। हमें तो विषय याद ही नहीं आता। इस शरीर में वह परमाणु ही नहीं हैं न। तभी तो ब्रह्मचर्य संबंधित ऐसी वाणी निकलती है न! विषय के सामने तो कोई बोला ही नहीं है। लोग विषयी हैं, इसलिए लोगों ने विषय पर उपदेश ही नहीं दिया, और अपने यहाँ तो ब्रह्मचर्य पर इतना कहा है कि पूरी किताब बन सके, और ठेठ तक की बात कही हैं क्योंकि हम में तो वे परमाणु ही खत्म हो चुके हैं, हम देह से बाहर रहते हैं। बाहर यानी निरंतर पड़ोसी की तरह रहते

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हैं! वर्ना ऐसा आश्चर्य मिल ही नहीं सकता न कभी भी!

ब्रह्मचर्य का एक और अब्रह्मचर्य के अनेक दुःख

प्रश्नकर्ता : लेकिन यह ब्रह्मचर्य, वह कुछ खाने के खेल नहीं हैं।

दादाश्री : ब्रह्मचर्य कुछ खाने के खेल नहीं हैं, तो अब्रह्मचर्य भी खाने के खेल नहीं हैं। अब्रह्मचर्य की जो पीड़ा है न, ब्रह्मचर्य में उसके बजाय बहुत कम पीड़ा है। ब्रह्मचर्य में एक ही प्रकार की पीड़ा है कि विषय की ओर ध्यान ही नहीं देना है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन इस पीड़ा से सुख तो बहुत उत्पन्न होता है। यदि इतना संभाल लिया कि उस ओर ध्यान ही न दे, तो पीड़ा के बजाय अंदर सुख उत्पन्न होगा।

दादाश्री : उसमें तो स्वभाविक रूप से सुख ही उत्पन्न होगा लेकिन उस पर ध्यान नहीं देने के लिए विषय का विचार आने से पहले ही उखाड़ दे और प्रतिक्रमण करके पूरा एक्जेक्टनेस में रहना पड़ता है। खेत में बीज पड़ने ही नहीं देंगे तो उगेगा ही कैसे? तेरा अंदर ठीक रहता है या बिगड़ गया है? पूरा ही बिगड़ गया है? थोड़ा-थोड़ा? तो अब कुछ सुधार कर ले! विषय के ये दुःख तो तुझसे सहन नहीं होंगे। यह तो मोटी खालवाले लोग हैं कि जो सहन कर सकते हैं, वे यातनाएँ। बाकी तू तो पतली खालवाला है, तो कैसे वे यातनाएँ सहन कर सकेगा?

प्रश्नकर्ता : लेकिन यदि बीज डल जाए और पेड़ बन जाए तो क्या करेगा? फिर फल खाना ही पड़ेगा न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन यह तो उन से कह रहा हूँ जो सावधान हो चुके हैं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन जो लोग संसार में हैं, उसे बीज पड़ गया और पेड़ बन गया तो?

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दादाश्री : उसका तो कोई उपाय ही नहीं है न !

प्रश्नकर्ता : फिर फल खाना ही पड़ेगा न ?

दादाश्री : फल खाए लेकिन पछतावे के साथ खाए, तो उस फल में से वापस बीज नहीं डलेंगे और खुशी से खाए कि, 'हाँ, आज तो बहुत मजा आया' तो वापस बीज डलेगा।

बाकी इसमें तो आदी हो जाता है। जरा भी ढीला छोड़ा कि वहाँ आदी हो जाता है इसलिए ढीला मत छोड़ना। मजबूत रहना। मर जाऊँ फिर भी यह नहीं चाहिए। इतना मजबूत रहना चाहिए।

दृष्टि से ही बिगड़ता है, ब्रह्मचर्य

ये लड़के हमारी बात का दुरुपयोग करेंगे, इसलिए हम ज्ञान की एक्जेक्ट बात नहीं बताते। हमने तो ज्ञान में सबकुछ देखा हुआ है, लेकिन एक्जेक्ट कह नहीं सकते क्योंकि यह अक्रम विज्ञान है और कर्म खपाए बिना का है। कर्म नहीं खपाए हैं इसलिए एक ओर जबरदस्त जोर है, उसकी वजह से फिर मन मुड़ जाता है। इस बात का दुरुपयोग करने जाएगा तो मारा जाएगा। यह सारी छूट तो इसलिए दे रखी है ताकि आप डरो नहीं। खाना आराम से। इस-इस तरह का ब्रह्मचर्य पालन करे तो भी बहुत हो गया।

प्रश्नकर्ता : इससे तो बहुत बड़ा 'ब्रेक' आ जाता है न ?

दादाश्री : हाँ, बड़ा 'ब्रेक' आ जाता है। हम चारित्र के बारे में बहुत सख्ती रखते हैं। फिर अगर 'व्यवस्थित' में शादी होगी, तो उसे कोई बाप भी नहीं छोड़नेवाला। वह मैं समझता हूँ न ?! लेकिन अगर अभी चारित्र में रहेगा तो उनकी लाइफ सुधर जाएगी और शायद शादी कर ली तो भी बाद में दूसरों पर आँखें नहीं गड़ाएगा न ?!

मोक्ष जाने में कुछ बाधक हो तो वह सिर्फ स्त्री विषय

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ही है और वह भी सिर्फ देखनेमात्र से ही बहुत बाधक है। व्यवहार में इतना ही भय है, इतना ही भय सिग्नल है। अन्य कहीं पर भय सिग्नल नहीं है। इसलिए लड़कों को कह रखा है न, कि स्त्री की तरफ देखना भी मत और देख लो तो उसका उपाय दिया है। साबुन लगाकर धो देना। इस काल में सबसे बड़ा पोइजन हो तो वह विषय ही है। इस काल के मनुष्य ऐसे नहीं हैं कि जिन्हें जहर नहीं चढ़े। ये तो कमजोर हैं बेचारे। जैसा मनचाहे वैसे कहीं भी घूमोगे तो जहर चढ़ेगा या नहीं?! यह तो आज्ञा में रहते हैं इसलिए जहर नहीं चढ़ता लेकिन अगर आज्ञा में नहीं रहे तो? एक ही बार आज्ञा टूटी कि पोइजन फैल जाएगा, तेजी से! इनकी बिसात ही नहीं न!

किसी की बहन पर दृष्टि बिगाड़ी है?

मुझे सब से ज्यादा चिढ़ इस बात की रहती है कि किसी पर भी दृष्टि कैसे बिगाड़ सकता है तू? तेरी बहन पर कोई खराब दृष्टि डाले तो तुझे कैसा लगेगा? उसी तरह अगर तू किसी की बहन पर दृष्टि बिगाड़ेगा तो? लेकिन इन लोगों को ऐसा विचार नहीं आता होगा न?

प्रश्नकर्ता : ऐसा विचार आता हो तो ऐसा कोई करेगा ही नहीं न?

दादाश्री : हाँ, कोई करेगा ही नहीं। लेकिन इतनी मूर्च्छा है न! इन लड़कों में तो इस ज्ञान के बाद बहुत बदलाव आ गया तो मुझे आनंद होगा न! नहीं तो मैं इन्हें बुलाऊँ भी नहीं क्योंकि मुझे तो चिढ़ आती है। अपने यहाँ तो चौदहवें साल में तो शादी करवा देनी चाहिए। चौदह साल की बेटी और अठारह साल का बेटा, इस तरह शादी करवा देनी चाहिए। लेकिन यह तो नई ही तरह का हो गया। यह भी कुदरत ने किया है। ईंसान थोड़े ही कुछ करता है? पहले तो सात साल में ही शादी करवा

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देते थे। उससे फिर उन लोगों की दृष्टि और कहीं भी नहीं जाती थी और वह लाइफ कितनी अच्छी! बच्चे भी कितने अच्छे होते थे! एक जैसे बच्चे!

प्रश्नकर्ता : यह एक बड़ा पॉइन्ट है। जिनकी दृष्टि नहीं बिगड़ती, उनके बच्चे एक जैसे होते हैं।

दादाश्री : और उसी से परंपरागत संस्कार आते थे। यह तो मार्केट मटिरियल जैसा हो गया है। बाजारू माल नहीं होता? वैसा!! ऐसा तो हो ही कैसे सकता है? यदि स्त्री एक पतिव्रत पालन करे और पति एक पत्नीव्रत पालन करे तो दोनों दर्शन करने योग्य कहलाएँगे।

इसलिए अपने यहाँ तो बेटे-बेटियों की जल्दी शादी करवा देनी चाहिए, अगर मेल खाए तो। मेल नहीं खाए तो भी तैयारी जल्दी शादी करवाने की रखना। यह माल रखने जैसा नहीं है तो फिर स्लिप होने से बचेगा, वरना यह तो बिगड़ता ही जा रहा है।

हमें तो बचपन से ही यह पसंद नहीं है कि लोगों ने इसमें सुख कैसे मान लिया है? मुझे ऐसा लगता है कि यह कैसा है? इन लोगों को तो खेलने के लिए जापनीज़ खिलौने चाहिए। खेलने के लिए ये जीवित खिलौने चाहिए, लेकिन जीवित खिलौने को मारोगे तो फिर काट लेगा न?! यह सब तो, कपड़े से ढका हुआ है इसलिए मोह होता है। हमें तो बचपन से ही श्री विज्ञान की प्रैक्टिस हो गई थी इसलिए हमें तो बहुत वैराग्य आता रहता था। बहुत ही धिन आती थी। ऐसी चीजों में ही इन लोगों को आराधना रहती है। यह तो किस तरह का कहलाएगा?

प्रतिक्रमण ही एक उपाय

प्रश्नकर्ता : ऐसा कहा गया है कि ज्ञान के बाद कुदृष्टि जोखिम है। अब कुदृष्टि वह चार्ज भाव है या डिस्चार्ज परिणाम है?

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दादाश्री : वह डिस्चार्ज परिणाम है, लेकिन साथ में उस परिणाम को धोने के लिए कहा है? वह परिणाम तो आएँगे, कुदृष्टि तो होगी, लेकिन साथ में हमने धोने के लिए कहा है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन धोना कैसे है? प्रतिक्रमण करके धोना है न?

दादाश्री : कहा ही है, और उस तरह से सब कर ही रहे हैं। इन सभी लड़कों को सहज रूप से निरंतर तप होता ही रहेगा। ये सभी ब्रह्मचर्य ब्रतवाले हैं। इन सभी को निरंतर ज्ञान-दर्शन-चारित्र और तप रहता है, इनके कपड़े ऐसे दिखते हैं लेकिन अंदर तो ज्ञान-दर्शन-चारित्र और तप रहता है।

युवा लोगों को विषय के बारे में मेरे पास समझना पड़ेगा। उसका विवरण समझना पड़ेगा तो फिर उस पर आसानी से अभाव होने लगागा, नहीं तो अभाव होगा ही नहीं न! उसका विवरण होना चाहिए, ज्ञानीपुरुष विवरण कर देते हैं। ज्ञानीपुरुष वह विवरण सभी को पब्लिक में नहीं बताते, दो-पाँच लोगों को रूबरू कह सकते हैं कि यह हकीकत क्या है। विषय बुद्धिपूर्वक का होता तब तो बहुत वैराग्य आ जाता। यह तो 'फूलिशनेस' है।

प्रश्नकर्ता : वहाँ पर जो राग होता है? वह क्या है?

दादाश्री : वह राग किस वजह से होता है? हकीकत में इसे समझा नहीं इसलिए। राग तो लोगों को ताश पर होता है, शराब पर होता है, लेकिन हकीकत जानते ही वह छूट जाता है। इसलिए हकीकत जाननी पड़ेगी कि यह अहितकारी है, यह चीज अच्छी नहीं है, वास्तव में इसमें सुख है ही नहीं, यह तो भास्यमान सुख है, तो छूट जाएगा। तुझे कभी दाद हुआ है? उस दाद को खुजलाने में और इसमें बिल्कुल भी अंतर नहीं है।

आप ऐसा कहो कि मुझसे मिठाई नहीं छूटती। तब मैं कहूँगा कि, कोई हर्ज नहीं, खाना क्योंकि वह जो खाता है, वह तो हकीकत

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है। बिल्कुल ही खोखली हकीकत नहीं है, लेकिन रिलेटिव में तो हकीकत है। जीभ को स्वाद आता है, वह तो रिलेटिव में हकीकत है। जबकि विषय तो किसी में है ही नहीं।

कैसा मोह, कि शौक से शादी करते हैं

यह स्त्री-पुरुष का जो विषय है न, उसमें दावे किए जाते हैं क्योंकि इस विषय में दोनों की मालिकी एक है और मत दोनों के अलग हैं। इसलिए यदि स्वतंत्र होना हो तो इस गुनहगारी में नहीं आना चाहिए और जिसके लिए यह गुनहगारी अनिवार्य है, उसे उसका निकाल करना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता : गुनहगारी में नहीं आना पड़े उसके लिए क्या शादी नहीं करनी चाहिए?

दादाश्री : शादी नहीं करनी चाहिए या करनी चाहिए, वह अपनी सत्ता की बात नहीं है। तुझे निश्चयभाव रखना चाहिए कि ऐसा नहीं हो तो उत्तम। जिस तरह गाड़ी में से गिरना चाहिए, क्या किसी की ऐसी इच्छा होती है? अपनी इच्छा कैसी होती है कि गिर न पड़े तो अच्छा। फिर भी अगर गिर जाएँ तो क्या होगा? उसी तरह शादी के लिए गिर न पड़े तो अच्छा। अपने भाव ऐसे रहने चाहिए।

प्रश्नकर्ता : यानी शादी करना गाड़ी में से गिरने के बराबर है?

दादाश्री : उसी तरह का है न, लेकिन वह मजबूरन ही होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : फिर उसे नाटक रूप में लेना पड़ेगा?

दादाश्री : और क्या? फिर चारा ही नहीं रहेगा न!

प्रश्नकर्ता : शादी करने में इतना जोखिम है, वह सुख दाद

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जैसा है तो फिर ये जो सब लोग शादी करते हैं, उन्हींने क्या मजबूरन शादी की है? शादी क्यों करते हैं?

दादाश्री : लोग तो खुशी से, शौक से शादी करते हैं। इसमें दुःख है, ऐसा नहीं जानते। वे तो ऐसा ही समझते हैं कि अंततः इसमें सुख है। लोग ऐसा समझते हैं कि थोड़ा बहुत नुकसान है लेकिन कुल मिलाकर फायदेवाली चीज है। जबकि हकीकत में बिल्कुल नुकसान ही है। वह जब 'इन्कमटैक्स' ऑफिस में जाता है तब पता चलता है कि यह सारा नुकसान ही था। और उसमें भी अपने हाथ में सत्ता नहीं है न? इस जन्म में अपने हाथ में नहीं है न? इस जन्म में तो अब नये सिरे से हमें 'डिसिज़न' आ जाता है, इसलिए साफ हो जाता है।

इसलिए श्रीमद् राजचंद्र ने कहा है कि, 'देखत भूली टले तो सर्व दुःखों का क्षय होगा।' वे खुद ही बताते हैं कि हमारे ज्ञान में तो बर्तता ही है कि इसमें पड़ने जैसा नहीं है। फिर भी देखते हैं और भूल हो जाती है। देखते हैं और भूल हो जाती है जबकि अपना ज्ञान तो ऐसा है कि देखता है फिर भी भूल नहीं होती क्योंकि जब देखे तब उसे 'शुद्धात्मा' दिखना चाहिए और 'शुद्धात्मा' दिखे तो फिर राग नहीं होगा।

'जवानी' सँभल जाए तो

इस जगत् में और किसी भी तरह का जोखिम नहीं है, सिर्फ इतना ही जोखिम है। कुछ लोगों को ऐसा होता है कि जो दाग लगा हो वह प्रतिक्रमण करने से धुल जाता है और कुछ लोगों को प्रतिक्रमण करने पर भी दाग नहीं जाते लेकिन ऐसे दो-चार ही होते हैं। उसके लिए उन्हें मेरे पास समझने के लिए आना पड़ेगा। तब मैं सब समझा दूँगा कि हकीकत में ऐसा है।

इस 'वॉर' (युद्ध) से आप बच जाओ। यह 'वॉर' बहुत बड़ी है। यह जवानी की 'वॉर' तो बहुत भारी है, पाकिस्तान से भी भारी।

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प्रश्नकर्ता : कुरुक्षेत्र से भी बड़ा?

दादाश्री : हाँ, उसके लिए अकेले में पूछना चाहिए। दो-पाँच लोग हों तो हर्ज नहीं, लेकिन पूछने से सब हल मिलेगा।

प्रश्नकर्ता : आपसे पूछा था कि ज्ञान का अपच का मतलब क्या है? तब आपने कहा था कि यह बात तो युवा लड़कों के लिए है। उन्हें ज्ञान का अपच हो जाता है, तो वह क्या है?

दादाश्री : जवान लोगों को ज्ञानजागृति पर आवरण आते देर नहीं लगती। वह जो आवरण आता है, वही ज्ञान का अजीर्ण है। जबकि बड़ों को ऐसे आवरण नहीं आते। उन्हें जवानी के जोश से आवरण आ जाता है, वह स्वाभाविक कहलाता है। हम उन्हें ऐसा नहीं कह सकते कि तुम ऐसे क्यों कर रहे हो? क्योंकि हम जानते हैं कि नौ बजे पानी आता है, तो फिर उस समय पानी आए बिना रहेगा ही नहीं न! फिर बारह बजे पानी आएगा? नहीं। नहीं आता। वैसा ही जोश जवानी में होता है। वह जोश आया कि तुरंत ही अंदर घोर अंधेरा कर देता है। उस तरह का घोर अंधकार आप बड़ी उम्रवालों को नहीं होता। आपको जागृति रहती है।

यह तो उपयोग नहीं है इसलिए गलतियाँ हो जाती हैं। उपयोग रखें तो गलती नहीं होगी। जैसे कि पैसे कमाते समय नुकसान नहीं हो और हर एक चीज़ में फायदा होना ही चाहिए, इसलिए हर एक चीज़ का भाव-ताव देखकर बेचते हैं, वरना अगर गड़बड़ कर दें तो फिर दुकान में नुकसान ही होगा। उसी तरह हर एक में शुद्ध उपयोग रखकर काम लेना पड़ेगा। वहाँ व्यापार में वैसी जागृति रहती है और यहाँ क्यों नहीं रही? यह बड़ा व्यापार है और फिर यह तो खुद का व्यापार है। जबकि वह तो पराया, चंद्रेश का व्यापार है। उससे 'हमें' लेना भी नहीं है और देना भी नहीं। यह तो खुद का व्यापार, उसमें कभी भी उपयोग के

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बिना नहीं होना चाहिए। कभी शायद आधा-पौना घंटा चूक गए, कहीं किसी की बात पर उलझ गए, तो प्रतिक्रमण कर लेना। प्रतिक्रमण करोगे तो फिर से जागृति आ जाएगी, लेकिन उलझते रहोगे तो अंत ही नहीं आएगा न? कभी किसी जन्म में ही ज्ञानीपुरुष मिलते हैं और वहाँ अगर हम कच्चे पड़ जाएँ, तो अपनी ही गलती है न?

प्रश्नकर्ता : ज्ञान का अपच नहीं हो, और उसमें से सेफ साइड की तरफ निकल जाएँ, वह कैसे?

दादाश्री : ऐसा है न, कि उसमें तो उस तरह से आज्ञा पालन करना पड़ेगा, पुरुषार्थ करना पड़ेगा। हमने एक ही बार कहा था कि विषय का यह जोखिम कितना है, उतना सुनकर तो सभी लड़कों ने पुरुषार्थ शुरू कर दिया।

यह 'अक्रम विज्ञान' तो बहुत ऊँची क्वालिटी का है। आज तुम्हें ऐसा लग रहा हो कि, कैसे हो पाएगा? लेकिन यह विज्ञान एक घंटे में तो क्या से क्या कर देता है! ज्ञानी पर आपको जैसा भाव आएगा, उतनी ही ज्ञान के परिणाम की मात्रा बढ़ती जाएगी। इसलिए इन लड़कों से मैंने कहा है कि 'तुम्हारी बात एक्सेप्ट करते हैं, लेकिन तुम्हें लालबत्ती रखनी है।' क्योंकि उन में अभी तक जवानी की शुरुआत नहीं हुई है। अभी उन्हें मुझ पर जितना लक्ष्य रहता है, उतना लक्ष्य जवानी में रहेगा और जवानी गुजर जाएगी, तब उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी लेकिन यदि लक्ष्य बदल गया तो दिक्कत आएगी, समझ लेना। फिर तो गिरा भी देगा। इसलिए उन्हें ये लालबत्तियाँ दिखाते हैं। कृपापात्र हो गए हो तो विषय को जीत जाएँगे, फिर भी लालबत्ती दिखानी पड़ती है। लालबत्ती नहीं दिखाएँगे तो ये लोग गाड़ी को यों ही छोड़ देंगे। इन कर्मों ने तो तीर्थकरों को भी नचाया है, तो फिर इनकी तो बिसात ही क्या?

इन लड़कों से मैं कहता हूँ कि तुम इस जागृति में रहते

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

हो, लेकिन अभी तुम्हारा रिज पॉइन्ट आना बाकी है। अभी तो तुम्हारी जवानी भी नहीं खिली है इसलिए बहुत कठिनाईयाँ आएगी। फिर भी मैंने ऐसा रास्ता दिखाया है कि आरपार निकल जाऐं और यदि उस रास्ते पर जाऐं तो आरपार निकल भी जाऐं। ऐसा विज्ञान तो किसी के पास भी नहीं है क्योंकि इस तरफ का, इस शरीर के बारे में सोचा ही नहीं होता न? ऐसा मानते हैं कि 'यह मैं ही हूँ' इसीलिए तो किसी को खुद के दोष नहीं दिखते। जहाँ स्थूल दोष ही नहीं दिखते, वहाँ पर, विषय के सामने तो कितनी सूक्ष्म जागृति की ज़रूरत है?! वह कैसे आएगी? यानी किसीने इसका केल्व्युलेशन किया ही नहीं न!

यह अपना सत्संग, ये बातें, ऐसी चीज़ है जो कभी भी सुनने में नहीं आए। यह सत्संग तो बुद्धि से परे वाला कहलाता है। बुद्धि का सत्संग तो हर कहीं होता है।

आनंद की अनुभूति वहाँ

'अक्रम विज्ञान' में मैंने कुछ परिवर्तन नहीं किया है। लेकिन लोग 'अक्रम विज्ञान' को समझ नहीं सके हैं। अनादि से लोग क्रमिक के ही अभ्यस्त हैं। वर्ना पूर्णता तक का काम हो जाए, ऐसा यह विज्ञान है। अक्रम विज्ञान को कब समझा जा सकता है? कि जो विषय के वैराग्यवाला हो और उसे 'अक्रम विज्ञान' मिल जाए, फिर तो उसका कल्याण ही हो गया न?! जिसे विषय अच्छे ही नहीं लगते, वह तो उच्च स्थिति कहलाती है। जैनों में भी जो उच्च स्थिति तक पहुँचे हुए होते हैं, वही वैराग्य लेते हैं। उन्हें तो बचपन से ही कुछ अच्छा नहीं लगता। उन्हें तो विषय की बात सुनते ही कंपकंपी आ जाती है। डेवेलप परिवार की जो बीस-बीस साल की लड़कियाँ और बीस-बीस साल के लड़के होते हैं, उन से विषय की बात की जाए तो उन्हें तो कंपकंपी आ जाती है। यह ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद उनका वह आनंद जाता ही नहीं है। अपार आनंद में रहते हैं क्योंकि मूल विषय

अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक (खंड-2-१७)

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कि जिसके आधार पर दुनिया खड़ी है, जिसकी वजह से ध्यान फ्रैक्वर हो जाता है, उनके लिए वह आधार रहता ही नहीं। एक ही बार अगर अब्रह्मचर्य का भाव उत्पन्न हो तो वह तीन-तीन दिनों तक ध्यान नहीं होने देता। फिर आत्मा का मूल्य समझ में आएगा क्या? और इन ब्रह्मचर्य ब्रतवालों को तो, यह ज्ञान है इसलिए आत्मा का आनंद तो पाया, लेकिन वह आनंद इस ब्रत की वजह से टिका हुआ है। फिर वह आनंद जाता ही नहीं। ये लोग बारह-बारह महीनों का ब्रत लेकर फिर यह अनुभव कर जाते हैं। फिर वापस आकर मुझ से क्या कहते हैं कि 'दादा, हम जो आनंद भोग रहे हैं, वह गजब का आनंद है। एक क्षण भी कुछ नहीं होता।' कहना पड़ेगा! ब्रह्मचर्य की इतनी पहुँच है, ऐसा तो मुझे भी पता नहीं था।

प्रश्नकर्ता : आपके पास भी वही था न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन मुझे यह पता नहीं था कि इसकी पहुँच इतनी अधिक है। मैं नहीं जानता था कि इस लड़के को इतना आनंद बर्ताता है और वह भी ब्रह्मचर्य की वजह से! क्योंकि ज्ञान तो सभी को दिया है और आत्मा का आनंद भी उत्पन्न हुआ है, लेकिन अब कौन इस आनंद को स्पर्श नहीं होने देता? विषयभाव, पाशवता।

प्रश्नकर्ता : ये जो बाहरवाले लोग ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, उन्हें ऐसा आनंद नहीं होता न?

दादाश्री : उन्हें आत्मा का आनंद नहीं होता। उन्हें तो पौद्गलिक आनंद उत्पन्न होता है और वहाँ तो पौद्गलिक आनंद को ही आत्मा का आनंद माना जाता है। फिर भी उससे उन्हें आनंद रहता है। भीतर जो क्लेश का वातावरण उत्पन्न करे, वैसा सब नहीं होता क्योंकि उनके हाथ में पुद्गलसार आ गया न! ब्रह्मचर्य मतलब पुद्गलसार और अध्यात्मसार मतलब शुद्धात्मा। और जिसे

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ये दोनों मिल जाएँ, उसका तो कल्याण ही हो गया न! लेकिन जिसके पास सिर्फ़ पुद्गलसार हो तो उसे भी थोड़ा-बहुत आनंद तो आएगा न? इस ब्रह्मचर्य के बल के सामने, उसे अन्य वृत्तियाँ परेशान नहीं करती।

प्रश्नकर्ता : उन ब्रह्मचारियों को कषाय परेशान नहीं करते?

दादाश्री : नहीं करते। ब्रह्मचारी कभी भी चिढ़ते ही नहीं। जो संसारी ब्रह्मचारी होते हैं, वे भी कभी नहीं चिढ़ते। उनका चेहरा देखने से भी आनंद होता है। ब्रह्मचर्य का तो तेज आता है। तेज नहीं आए तो ब्रह्मचर्य कैसा? अतः यदि संसार में भी ब्रह्मचर्य मानना हो तो किसका मानना कि जिनके चेहरे पर तेज हो। ब्रह्मचारी पुरुष तो तेजवान होते हैं।

ब्रह्मचर्य आत्मा के स्वभाविक गुणों को प्रकट होने देता है, आत्मा का अनुभव होने देता है, सभी गुणों का अनुभव होने देता है। जबकि अब्रह्मचर्य के भाव की वजह से आत्मा के सभी गुणों का अनुभव होने के बावजूद भी ऐसा लगता है अनुभव नहीं हुआ है। स्थिरता नहीं रहती। 'इस' एक चीज में अनुकूलता आ गई तो सभी में अनुकूलता आ जाती है। सबकुछ अनुकूल हो जाता है।

व्यवहार गढ़ता है ब्रह्मचारियों को

इन ब्रह्मचारियों की सभी पीड़ा ही मिट गई न, फिर भी उन्हें व्यवहार सीखने में बहुत टाइम लगेगा। व्यवहारिकता आनी चाहिए न? आत्मा जाना लेकिन वह व्यवहार समेत होना चाहिए। सिर्फ़ खुद का कल्याण हो गया, उससे क्या फर्क पड़ा? ये लोग तो कहते हैं कि 'हमें तो जगत् कल्याण में दादा का पूरा-पूरा साथ देना है।' इसलिए ये ब्रह्मचर्य पालन कर रहे हैं। यह तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था, ऐसा नया ही अंकुर फूटा है।

मैं तो ऐसा समझता था कि इस काल में ब्रह्मचर्य रह ही

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नहीं सकता। पिछले जन्म में भावना की हो, उसे तो रह ही सकता है, और अपने साधु-आचार्यों को रहता ही है न! लेकिन अन्य सामान्य लोगों की तो बिसात ही नहीं न! जहाँ निरंतर जलन में जलते रहते हैं, वहाँ पर कोई ब्रह्मचर्य की बातें करने जाएगा क्या? और करेगा तो कोई सुनेगा भी नहीं! लेकिन ऐसे काल में अपने यहाँ यह नया ही निकला है। ब्रह्मचर्य का ऐसा रास्ता निकलेगा, ऐसा तो मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। इस जगत् का कल्याण होनेवाला हो, तभी ऐसा मिलता है न? वर्ना ऐसा सब कहाँ से मिलेगा? हमने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हमें ऐसा चाहिए या हमें ऐसा करना है। अभी तो, लड़के सामने से ब्रह्मचर्य के लिए आ रहे हैं।

ऊर्ध्व रेत हो न, तो काम हो जाएगा। उसके बाद जो वाणी निकलती है, उसके बाद जो संयम सुख आता है, उसकी तो बात ही अलग है। इसलिए मैं ऐसा करना चाहता हूँ इन ब्रह्मचारियों के लिए। उन्हें समझा-समझाकर मोड़ने की कोशिश करके और ज्ञान के अनुसार ब्रह्मचर्य की ओर मुड़ जाएँ, ऐसा कर देता हूँ, और मुड़ सकते हैं।

प्रश्नकर्ता : मुड़ सकते हैं, यह शब्द तो योग्य नहीं लग रहा है क्योंकि मुड़ सकते हैं, दबा भी सकते हैं, उछल भी सकते हैं, लेकिन ज्ञान से आप उन पर कृपा करें तो बहुत अच्छा हो जाता है।

दादाश्री : हाँ, कृपा ही। वह तो ये शब्द मुँह से बोलने पड़ते हैं। बाकी कृपा से होता है।

प्रश्नकर्ता : कृपा के बिना वह साध्य नहीं है, दादा।

दादाश्री : और तैयार हो जाएँगे तो इस देश का कुछ कल्याण कर सकेंगे। तैयार हो जाएँगे सभी।

ब्रह्मचर्य के लिए दादा ने यह कितनी सुंदर बाड़ बना दी