भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 310 में से

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अग्निरिन्द्राय पवते दिवि शुक्रो वि राजति। महिषीव वि जायते.. (४) अग्नि इंद्र के लिए प्रज्वलित होती है. वह स्वर्गलोक में विशेष रूप से चमकती हुई शोभित होती है. वह महारानी के समान दिखाई देती है. (४) यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति. यो जागार तमय २४ सोम आह तवाहम्स्मि सख्ये न्योकाः.. (५) जो जाग्रत हैं, ऋचाएं उन की कामना करती हैं. जो जाग्रत हैं, उन्हें ही सोम प्राप्त होते हैं. जो जाग्रत हैं, उन्हीं से सोम कहते हैं कि मैं तुम्हारा मित्र हूं. (५) अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते ऽ ग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति. अग्निर्जागार तमय २४ सोम आह तवाहम्स्मि सख्ये न्योकाः.. (६) अग्नि जाग्रत हैं, अतः ऋचाएं उन की कामना करती हैं, सोम उन्हें प्राप्त होते हैं. अग्नि जाग्रत हैं, अतः उन्हीं से सोम कहते हैं कि मैं तुम्हारा मित्र हूं. (६) नमः सखिभ्यः पूर्वसद्भ्यो नमः साकंनिषेभ्यः. युञ्जे वाच २४ शतपदीम्.. (७) यज्ञ में शुरू से प्रतिष्ठित देवताओं को हमारा नमस्कार. मित्र देवताओं को नमस्कार. सैकड़ों पदों वाली ऋचाएं देवताओं तक पहुंचने की कृपा करें. (७) युञ्जे वाच २४ शतपदीं गाये सहस्रवर्तनि. गायत्रं त्रैष्टुभं जगत्.. (८) गायत्री, त्रिष्टुप् एवं जगती छंद में सामों को हजारों प्रकार से गाते हैं. सैकड़ों पदों वाली ऋचाएं देवताओं के लिए गाई जाती हैं. (८) गायत्रं त्रैष्टुभं जगद्विश्वारूपाणि सम्भृता. देवा ओका २४ सि चक्रिरे.. (९) हे अग्नि! गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती छंद में निबद्ध सामों को अनेक रूपों में (अनेक प्रकार से) आप के लिए गाया जाता है. (९) अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निरिन्द्रो ज्योतिर्ज्योतिरिन्द्रः. सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः.. (१०) हे अग्नि! अग्नि ज्योति है, ज्योति अग्नि है. इंद्र ज्योति है, ज्योति इंद्र है. सूर्य ज्योति है, ज्योति ही सूर्य है. (१०) पुनरूर्जा नि वर्तस्व पुनरग्न इषायुषा. पुनर्नः पाह्य २४ हंसः.. (११) हे अग्नि! आप ऊर्जा रूप में पधारिए. आप हमें अन्न प्रदान कीजिए. आप हमें दीर्घायु दीजिए. आप बारबार पापों से हमें बचाइए. (११) सह रय्या नि वर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (१२) हे अग्नि! आप सभी धनों को साथ ले कर पधारने की कृपा कीजिए. संसार में आनंद ebook converter DEMO Watermarks*