समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 7 नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी द्रव्यों के उपभोग में विरक्त रहता हुआ (वैराग्य की सामर्थ्य से) कर्मों से नहीं बँधता। ज्ञानी और अज्ञानी में अन्तर - सेवंतो वि ण सेवदि असेवमाणो वि सेवगो को वि। पगरणचेट्ठा कस्स वि ण य पायरणो त्ति सो होदि॥ (7-5-197) कोई सम्यग्दृष्टि (रागादि भाव के अभाव के कारण) विषयों का सेवन करता हुआ भी उनका सेवन नहीं करता, (और अज्ञानी विषयों में रागभाव के कारण) उन्हें सेवन न करता हुआ भी सेवन करने वाला होता है। जैसे - किसी पुरुष की कार्यसम्बन्धी क्रिया होती है, किन्तु वह कार्य करने वाला नहीं होता। विशेष - जैसे कोई मुनीम सेठ की ओर से व्यापार का सब कार्य करता है, किन्तु उस व्यापार तथा उसकी लाभ-हानि का वह स्वामी नहीं होता। इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि भोगों का सेवन करता हुआ भी राग न होने के कारण उसका असेवक है और मिथ्यादृष्टि सेवन न करता हुआ भी राग के सद्भाव के कारण उसका सेवक है। 95