भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 7 अप्पाणमयाणंतो अणप्पयं चावि सो अयाणंतो। किह होदि सम्मदिट्ठी जीवाजीवे अयाणंतो॥ (7-10-202) वास्तव में जिस जीव के रागादि (अज्ञान भावों) का परमाणुमात्र (लेशमात्र) भी विद्यमान है, वह जीव सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञाता होने पर भी आत्मा को नहीं जानता और आत्मा को न जानता हुआ वह अनात्मा को भी नहीं जानता। इस प्रकार जीव और अजीव को न जानने वाला किस प्रकार सम्यग्दृष्टि हो सकता है? In reality, the Self who entertains even a very small amount of attachment etc. (wrong dispositions), is not aware of the true nature of the soul, although he may have mastered all scriptures. And since he does not know the soul, he does not know the non-soul too. How can the one who does not know the soul and the non-soul be a right believer? ज्ञान ही आत्मा का पद है - आदम्हि दव्वभावे अपदे मॉत्तूण गिण्ह तह णियदं। थिरमेगमिमं भावं उवलब्भंतं सहावेण॥ (7-11-203) आत्मा में द्रव्य और भावों के मध्य में (अतत्स्वभाव से अनुभव में आने वाले भाव) अपद हैं (क्षणिक होने से आत्मा का स्थान नहीं ले सकते); अतः उन्हें छोड़कर नियत, स्थिर तथा एक स्वभाव से अनुभव करने योग्य इस भाव को (चैतन्यमात्र ज्ञानभाव को) ग्रहण कर। In the midst of material and psychical karmas, the transitory dispositions that arise in the Self cannot take the place of the 98