समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 7 ज्ञानी वेद्य-वेदक भाव की आकांक्षा नहीं करता - जो वेददि वेदिज्जदि समये समये विणस्सदे उहयं। तं जाणगो दु णाणी उहयं पि ण कंखदि कयावि॥ (7-24-216) जो अनुभव करता है (ऐसा वेदक भाव), जो अनुभव किया जाता है (ऐसा वेद्यभाव), ये दोनों भाव (अर्थपर्याय की अपेक्षा) समय-समय में नष्ट हो जाते हैं। ऐसा जानने वाला ज्ञानी उन दोनों भावों की कदापि आकांक्षा नहीं करता। संसार, शरीर, भोग से विरक्त - बंधुवभोगणिमित्ते अज्झवसाणोदयेसु णाणिस्स। संसारदेहविसयेसु णैव उप्पज्जदे रागो॥ (7-25-217) बन्ध और उपभोग के निमित्तभूत संसार-सम्बन्धी और देह-सम्बन्धी रागादि अध्यवसानों के उदय में ज्ञानी के राग उत्पन्न नहीं होता।