भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 7 its shell and adopts blackness, it loses its white character. Similarly, the knower also when he, on his own, discards his knowledge-character and dwells into ignorance, it acquires nescience. ज्ञानी निष्काम कर्म करता है - पुरिसो जह को वि इहं वित्तिणिमित्तं तु सेवदे रायं। तो सो वि देदि राया विविहे भोगे सुहुप्पादे॥ (7-32-224) एमेव जीवपुरिसो कम्मरयं सेवदे सुहणिमित्तं। तो सो वि देदि कम्मो विविहे भोगे सुहुप्पादे॥ (7-33-225) जय पुण सोच्चिय पुरिसो वित्तिणिमित्तं ण सेवदे रायं। तो सो ण देदि राया विविहे भोगे सुहुप्पादे॥ (7-34-226) एमेव सम्मदिट्ठी विसयत्थं सेवदे ण कम्मरयं। तो सो ण देदि कम्मो विविहे भोगे सुहुप्पादे॥ (7-35-227) जिस प्रकार इस लोक में कोई पुरुष आजीविका के लिए राजा की सेवा करता है, तो वह राजा भी उसे सुख देने वाले नाना प्रकार के भोग देता है; इसी प्रकार जीव पुरुष सुख के लिए कर्मरज की सेवा करता है तो वह कर्म भी उसे सुख देने वाले नाना प्रकार के भोग देता है। 108