समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 8 जीव कर्म के उदय से दुखी-सुखी होते हैं - कम्मोदयेण जीवा दुक्खिदसुहिदा हवंति जदि सव्वे। कम्मं च ण देसि तुमं दुक्खिदसुहिदा किह कदा ते॥ (8-18-254)
कम्मोदयेण जीवा दुक्खिदसुहिदा हवंति जदि सव्वे। कम्मं च ण दिंति तुमं कदोसि किह दुक्खिदो तेहिं॥ (8-19-255)
कम्मोदयेण जीवा दुक्खिदसुहिदा हवंति जदि सव्वे। कम्मं च ण दिंति तुमं किह तं सुहिदो कदो तेहिं॥ (8-20-256)
यदि कर्म के उदय से सब जीव दुखी और सुखी होते हैं और तू उन्हें कर्म तो देता नहीं है, तब वे जीव तूने दुखी और सुखी किस प्रकार किये। यदि सभी जीव कर्म के उदय से दुखी और सुखी होते हैं और वे तुझे कर्म देते नहीं, तब तुझे उन जीवों ने किस प्रकार दुखी किया। यदि सभी जीव कर्म के उदय से दुखी और सुखी होते हैं और वे जीव तुझे कर्म तो देते नहीं हैं, तब उन्होंने तुझे सुखी कैसे किया।
If all living beings become miserable or happy due to the fruition of karmas, and since you do not give them karmas, how have you made them miserable or happy? If all living beings become miserable or happy due to the fruition of karmas, and since they do not give you karmas, how have they 122