भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 8 जाव ण पच्चक्खाणं अप्पडिकमणं च दव्वभावाणं। कुव्वदि आदा ताव दु कत्ता सो होदि णादव्वो॥ (8-49-285) (पूर्वानुभूत विषयरागादिरूप) अप्रतिक्रमण दो प्रकार का है। इसी प्रकार (भावी विषयाकांक्षारूप) अप्रत्याख्यान (दो प्रकार का) जानना चाहिये। इस उपदेश से आत्मा अकारक कहा गया है। अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यान भी द्रव्य और भावरूप से दो प्रकार का है। इस उपदेश से आत्मा अकारक कहा गया है। जब तक आत्मा द्रव्य और भाव का प्रत्याख्यान नहीं करता और प्रतिक्रमण नहीं करता, तब तक वह आत्मा (कर्मों का) कर्ता होता है, ऐसा जानना चाहिये। ज्ञानी मुनि को आहार निमित्तक बन्ध नहीं है - आधाकम्मादीया पोग्गलदव्वस्स जे इमे दोसा। किह ते कुव्वदि णाणी परदव्वगुणा दु जे णिच्चं॥ (8-50-286) 136