भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

अध्याय - 9 णवमो मॉक्खाधियारो THE LIBERATION बन्ध के ज्ञानमात्र से मोक्ष नहीं - जह णाम को वि पुरिसो बंधणयम्हि चिरकालपडिबद्धो। तिव्वं मंदसहावं कालं च वियाणदे तस्स॥ (9-1-288) जदि ण वि कुव्वदि छेदं ण मुच्चदे तेण बंधणवसो सं। कालेण दु बहुगेण वि ण सो णरो पावदि विमॉक्खं॥ (9-2-289) इय कम्मबंधणाणं पदेसपयडिट्ठिदी य अणुभागं। जाणंतो वि ण मुच्चदि मुच्चदि सव्वे जदि विसुद्धो॥ (9-3-290) जैसे बन्धन में बहुत समय से बँधा हुआ कोई पुरुष उस बन्धन के तीव्र-मन्द स्वभाव को और उसके काल को जानता है, यदि वह उस बन्धन को नहीं काटता है तो वह उस बन्धन से नहीं छूटता और बन्धन के वश हुआ वह मनुष्य बहुत काल में भी छुटकारा नहीं पाता। इसी प्रकार जीव कर्म-बन्धनों के प्रदेश, प्रकृति, स्थिति और अनुभाग को जानता हुआ भी कर्म-बन्ध से नहीं छूटता। यदि वह रागादि को दूरकर शुद्ध होता है तो सम्पूर्ण कर्म-बन्ध से छूट जाता है। ••••••••••••••••••••• 138