भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 9 मैं दृष्टा मात्र हूँ - पण्णाए घेत्तव्वो जो दट्ठा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-11-298) प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो देखने वाला दृष्टा है, निश्चय से वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये। Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really the ‘seer’ who sees; and, further, that all other dispositions are not part of oneself. मैं ज्ञातामात्र हूँ - पण्णाए घेत्तव्वो जो णादा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-12-299) प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो जानने वाला ज्ञाता है, निश्चय से वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये। Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really the ‘knower’ who knows; and, further, that all other dispositions are not part of oneself. 143