समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 10 asserted by ordinary people and monks, is the view of the wrong believers. ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ भाव कर्म का कर्ता जीव है - मिच्छत्तं यदि पयडी मिच्छादिट्ठी करेदि अप्पाणं। तम्हा अचेदणा दे पयडी णणु कारगा पत्ता॥ (10-21-328) अहवा एसो जीवो पोग्गलदव्वस्स कुणदि मिच्छत्तं। तम्हा पोग्गलदव्वं मिच्छादिट्ठी ण पुण जीवो॥ (10-22-329) अह जीवो पयडी तह पोग्गलदव्वं कुणंति मिच्छत्तं। तम्हा दोहि कदं तं दोण्हि वि भुंजंति तस्स फलं॥ (10-23-330) अह ण पयडी ण जीवो पोग्गलदव्वं करेदि मिच्छत्तं। तम्हा पोग्गलदव्वं मिच्छत्तं तं तु ण हु मिच्छा॥ (10-24-331) यदि (मोहनीय कर्म की) मिथ्यात्व प्रकृति आत्मा को मिथ्यादृष्टि करती है, इस मान्यता से तेरे मतानुसार अचेतन प्रकृति निश्चय ही मिथ्यात्व भाव की कर्ता हो गई; अथवा यह जीव पुद्गल द्रव्य के मिथ्यात्व को करता है, ऐसा माना जाए तो पुद्गल द्रव्य मिथ्यादृष्टि सिद्ध होगा, जीव नहीं; अथवा जीव तथा प्रकृति - ये दोनों पुद्गल द्रव्य को मिथ्यात्वरूप करते हैं, ऐसा मानने से दोनों के द्वारा किये गये मिथ्यात्व के •••••••••••••••••••• 157