भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से स्पर्श करता है - असुहो सुहो व फासो ण तं भणदि फास मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं कायविसयमागदं फासं॥ (10-72-379) अशुभ या शुभ स्पर्श तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे स्पर्श कर' और आत्मा भी स्पर्शन इन्द्रिय के विषय में आये हुए स्पर्श को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। आत्मा अपने स्वरूप से गुण को जानता है - असुहो सुहो व गुणो ण तं भणदि बुज्झ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं बुद्धिविसयमागदं तु गुणं॥ (10-73-380) अशुभ या शुभ गुण तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे जान' और आत्मा भी बुद्धि के विषय में आये हुए गुण को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। 179