समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 10 अज्ञानचेतना ही कर्म-बंध का कारण है - वेदंतो कम्मफलं अप्पाणं जो दु कुणदि कम्मफलं। सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥ (10-80-387) वेदंतो कम्मफलं मये कदं जो दु मुणदि कम्मफलं। सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥ (10-81-388) वेदंतो कम्मफलं सुहिदो दुहिदो य हवदि जो चेदा। सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥ (10-82-389) कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा कर्म के फल को निजरूप करता है (मानता है) वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है। कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा ‘कर्म का फल मैंने किया' ऐसा मानता है, वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है। कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा सुखी और दुखी होता है, वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है। Experiencing the fruits of karmas, the Self who identifies himself with those fruits of karmas, bonds himself again with the seeds of misery in the form of eight kinds of karmas. Experiencing the fruits of karmas, the Self who believes that he is the creator of those fruits of karmas, bonds himself again with •••••••••••••••••••• 183