भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 1 'समय' की सुन्दरता - एयत्तणिच्छयगदो समओ सव्वत्थ सुंदरो लोगे। बंधकहा एयत्ते तेण विसंवादिणी होदि॥ (1-3-3) एकत्व निश्चय को प्राप्त (निश्चय से अपने स्वभाव में स्थित) शुद्ध आत्मा ही लोक में सर्वत्र सुंदर है (शोभा को प्राप्त होता है), इसलिए एकत्व में (दूसरे के साथ) बन्ध की कथा विसंवाद करने वाली है। विशेष - जीव अपने स्वभाव में स्थित रहने पर ही शोभा को प्राप्त होता है। (यद्यपि 'समय' शब्द से - धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल एवं जीव - सभी द्रव्य लिये जाते हैं, तथापि यहाँ आत्मा अभिप्रेत है। पुद्गल कर्म के साथ जीव का बन्ध होने पर जीव में विसंवाद खड़ा होता है। इसी प्रकार धर्म, अधर्म आदि सभी अपने-अपने स्वभाव में स्थित ही सुन्दर होते हैं।)