समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 1 शुद्धनय का लक्षण - जो पस्सदि अप्पाणं अबद्धपुट्ठं अणण्णयं णियदं। अविसेसमसंजुत्तं तं सुद्धणयं वियाणाहि॥ (1-14-14) जो नय शुद्धात्मा को बन्ध रहित, पर के स्पर्श से रहित, अन्यत्व रहित, नियत (चलाचलतादि रहित), ज्ञान दर्शनादि के भेद से रहित और अन्य के संयोग से रहित ऐसे छह भावरूप (आत्मा में) देखता है, उसे शुद्धनय जानो। जो आत्मा को देखता है वही जिनशासन को जानता है - जो पस्सदि अप्पाणं अबद्धपुट्ठं अणण्णमविसेसं। अपदेस-संत-मज्झं पस्सदि जिणसासणं सव्वं॥ (1-15-15) जो भव्यात्मा आत्मा को अबद्ध, अस्पृष्ट, अनन्य, अविशेष (तथा उपलक्षण से पूर्वोक्त गाथा में कथित नियत और असंयुक्त) निरंश-अखण्ड एवं परम शान्त भावस्थित आत्मा में देखता है, जानता है, अनुभव करता है - वही आत्मा सम्पूर्ण जिनशासन - स्वसमय और परसमय को जानता है। 11