समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
पृष्ठ 37, कुल 226 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 37
अध्याय - 1 प्रत्याख्यान ज्ञान है - सव्वे भावे जम्हा पच्चक्खादी परे त्ति णादूण। तम्हा पच्चक्खाणं णाणं णियमा मुणेदव्वं॥ (1-34-34) यतः सब भावों को पर हैं यह जानकर त्याग देता है। इस कारण प्रत्याख्यान ज्ञान ही है, ऐसा निश्चय से (मननपूर्वक) जानना चाहिए। ज्ञानी द्वारा परभावों का त्याग - जह णाम को वि पुरिसो परदव्वमिणं ति जाणिदुं मुयदि। तह सव्वे परभावे णादूण विमुंचदे णाणी॥ (1-35-35) जैसे लोक में कोई पुरुष यह पर द्रव्य है ऐसा जानकर उसे त्याग देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परभावों को, ये परभाव हैं ऐसा जान कर उन्हें छोड़ देता है। 20