भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 2 दुदियो जीवाजीवाधियारो THE SOUL AND THE NON-SOUL जीव के सम्बन्ध में विभिन्न मान्यतायें - अप्पाणमयाणंता मूढा दु परप्पवादिणो केई। जीवं अज्झवसाणं कम्मं च तहा परूवंति॥ (2-1-39) अवरे अज्झवसाणेसु तिव्वमंदाणुभावगं जीवं। मण्णंति तहा अवरे णोकम्मं चावि जीवो त्ति॥ (2-2-40) कम्मस्सुदयं जीवं अवरे कम्माणुभागमिच्छंति। तिव्वत्तणमंदत्तण गुणेहि जो सो हवदि जीवो॥ (2-3-41) जीवो कम्मं उभयं दोण्णि वि खलु के वि जीवमिच्छंति। अवरे संजोगेण दु कम्माणं जीवमिच्छंति॥ (2-4-42) एवंविहा बहुविहा परमप्पाणं वदंति दुम्मेहा। ते ण परमट्ठवादी णिच्छयवादीहि णिद्दिट्ठा॥ (2-5-43) आत्मा को न जानते हुए परद्रव्य आत्मा को कहने वाले मूढ़ अज्ञानी तो रागादि अध्यवसान को और कर्म को जीव कहते हैं। अन्य कुछ लोग रागादि अध्यवसानों में तीव्र-मन्द तारतम्य स्वरूप शक्ति-माहात्म्य को जीव मानते हैं; तथा अन्य कोई नोकर्म-शरीरादि को भी जीव है ऐसा मानते हैं। अन्य कुछ लोग कर्म के उदय को जीव मानते हैं। कुछ लोग जो तीव्रता-मन्दता रूप गुणों से भेद को प्राप्त होता है, वह 23