समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 2 परमार्थ जीव का स्वरूप - अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं। जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं॥ (2-11-49) जो रसरहित है, रूपरहित है, गंधरहित है, इन्द्रियों के अगोचर है, चेतना गुण से युक्त है, शब्दरहित है, किसी चिह्न या इन्द्रिय द्वारा ग्रहण नहीं होता और जिसका आकार बताया नहीं जा सकता, उसे जीव जानो। वर्णादि भाव जीव के परिणाम नहीं हैं - जीवस्स णत्थि वण्णो ण वि गंधो ण वि रसो ण वि य फासो। ण वि रूवं ण सरीरं ण वि संठाणं ण संहणणं॥ (2-12-50) जीवस्स णत्थि रागो ण वि दोसो णेव विज्जदे मोहो। णो पच्चया ण कम्मं णोकम्मं चावि से णत्थि॥ (2-13-51) जीवस्स णत्थि वग्गो ण वग्गणा णेव फड्डया केई। णो अज्झप्पट्ठाणा णेव य अणुभागठाणा वा॥ (2-14-52) 27