समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 2 किन्तु कोई मार्ग नहीं लुटता (वस्तुतः पथिक लुटते हैं), इसी प्रकार जीव में कर्मों और नोकर्मों का वर्ण देखकर जीव का यह वर्ण है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने व्यवहार से कहा है। इसी प्रकार गंध, रस, स्पर्श, रूप, शरीर और जो संस्थान आदि जीव के हैं, वे सब व्यवहार से निश्चयदर्शी कहते हैं। संसारी जीवों के वर्णादि का सम्बन्ध - तत्थ भवे जीवाणं संसारत्थाण होंति वण्णादी। संसारपमुक्काणं णत्थि दु वण्णादओ केई॥ (2-23-61) संसार अवस्था में संसारी जीवों के वर्णादि भाव होते हैं। संसार से मुक्त जीवों के तो कोई वर्णादि नहीं हैं। 31