समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
पृष्ठ 51, कुल 226 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 51
अध्याय - 2 देह की जीव संज्ञा व्यवहार से है - पज्जत्तापज्जत्ता जे सुहुमा बादरा य जे जीवा। देहस्स जीवसण्णा सुत्ते ववहारदो उत्ता॥ (2-29-67) जो पर्याप्त तथा अपर्याप्त और जो सूक्ष्म तथा वादर जीव कहे गये हैं, वे देह की अपेक्षा जीव संज्ञाएँ हैं। वे सब परमागम में व्यवहार नय से कही गई हैं। गुणस्थान जीव नहीं हैं - मोहणकम्मस्सुदया दु वण्णिदा जे इमे गुणट्ठाणा। ते किह हवंति जीवा जे णिच्चमचेदणा उत्ता॥ (2-30-68) जो ये गुणस्थान हैं, वे मोहनीय कर्म के उदय से बतलाये गये हैं। जो नित्य अचेतन कहे गये हैं, वे जीव किस प्रकार हो सकते हैं? इदि दुदियो जीवाजीवाधियारो समत्तो 34