भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 3 आत्म स्वभाव में स्थिति से आस्रवों का क्षय - अहमिक्को खलु सुद्धो य णिम्ममो णाणदंसणसमग्गो। तम्हि ठिदो तच्चित्तो सव्वे एदे खयं णेमि॥ (3-5-73) (ज्ञानी विचार करता है कि-) मैं निश्चय ही एक हूँ, शुद्ध हूँ, ममत्वरहित हूँ और ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण हूँ। (उक्त लक्षण वाले) शुद्धात्मस्वरूप में स्थित और सहजानन्द स्वरूप में तन्मय हुआ मैं इन सब (क्रोधादिक आस्रवों) को नष्ट करता हूँ। (The well-informed asserts that –) I am really one, pure, free from possessive desires, and replete with knowledge and perception. Resting on pure consciousness (with the above- mentioned attributes), and self-contented, I lead all the karmic influxes (like anger) to destruction. ज्ञानी आस्रवों से निवृत्त होता है - जीवणिबद्धा एदे अधुव अणिच्चा तहा असरणा य। दुक्खा दुक्खफला त्ति य णादूण णिवत्तदे तेहिं॥ (3-6-74) ये क्रोधादि आस्रव जीव के साथ निबद्ध हैं, अध्रुव हैं, अनित्य हैं तथा अशरण हैं (रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं) और ये दुःखरूप हैं और दुःखरूप फल देने वाले हैं। यह जानकर (ज्ञानी) उन आस्रवों से निवृत्त होता है। These influxes like anger are associated with the soul, destructible, evanescent, incapable of providing refuge, misery themselves, and result into misery. Knowing this, the well- informed abandons them. 37