समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - ३ आत्मा जिस भाव को करता है, वह उस भाव का कर्ता होता है - जं कुणदि भावमादा कत्ता सो होदि तस्स भावस्स। कम्मतं परिणमदे तम्हि सयं पोग्गलं दव्वं॥ (3-23-91) आत्मा जिस भाव को करता है, वह उस भाव का कर्ता होता है। उसके कर्ता होने पर पुद्गल द्रव्य स्वयं कर्मरूप परिणमित होता है। अज्ञान से कर्मों का कर्तृत्व है - परमप्पाणं कुव्वं अप्पाणं पि य परं करंतो सो। अण्णोणमओ जीवो कम्माणं कारगो होदि॥ (3-24-92) पर को अपने रूप करता हुआ और अपने को पररूप करता हुआ वह अज्ञानी जीव कर्मों का कर्ता होता है। 46