भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 226 में से

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अध्याय - 3 इसी बात को विशेष रूप से कहते हैं - तिविहो असुवओगो अप्पवियप्पं करेदि धम्मादी। कत्ता तस्सुवओगस्स होदि सो अत्तभावस्स॥ (3-27-95) वह (मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरति रूप) तीन प्रकार का उपयोग 'मैं धर्मादिक हूँ' ऐसा आत्मविकल्प करता है। वह आत्मा उस उपयोगरूप अपने भाव का कर्ता होता है। कर्तृत्व का मूल अज्ञान है - एवं पराणि दव्वाणि अप्पयं कुणदि मंदबुद्धीए। अप्पाणं अवि य परं करेदि अण्णाणभावेण॥ (3-28-96) इस प्रकार मन्दबुद्धि (अज्ञानी) अज्ञानभाव से परद्रव्यों को अपने रूप करता है और अपने को भी पररूप करता है। 48

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