भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 3 व्याप्य-व्यापक भाव से आत्मा कर्ता नहीं है - जदि सो परदव्वाणि य करेज्ज णियमेण तम्मओ होज्ज। जम्हा ण तम्मओ तेण सो ण तेसिं हवदि कत्ता॥ (3-31-99) यदि वह (आत्मा) परद्रव्यों को करे तो नियम से वह तन्मय (परद्रव्यमय) हो जाए; क्योंकि वह तन्मय नहीं होता, इस कारण वह कर्ता नहीं है। निमित्त-नैमित्तिक भाव से भी जीव कर्ता नहीं है - जीवो ण करेदि घडं णेव पडं णेव सेसगे दव्वे। जोगुवओगा उप्पादेगा य तेसिं हवदि कत्ता॥ (3-32-100) जीव घट को नहीं करता, न ही पट को करता है, न ही शेष द्रव्यों को करता है। जीव के योग और उपयोग घटादि के उत्पन्न करने में निमित्त हैं। उन योग और उपयोग का कर्ता जीव है। 50