भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

अध्याय - 3 गुणसण्णिदा दु एदे कम्मं कुव्वंति पच्चया जम्हा। तम्हा जीवोऽकत्ता गुणा य कुव्वंति कम्माणि॥ (3-44-112) ये मिथ्यात्वादि प्रत्यय निश्चय से अचेतन हैं क्योंकि ये पुद्गल कर्म के उदय से उत्पन्न होते हैं। यदि वे प्रत्यय कर्म करते हैं तो करें, उन कर्मों का भोक्ता भी आत्मा नहीं है; क्योंकि ये गुणस्थान नामक प्रत्यय कर्म करते हैं इसलिए (निश्चय नय से) जीव कर्मों का कर्ता नहीं है और गुणस्थान नामक प्रत्यय ही कर्मों को करते हैं। These conditions of influx of karmas resulting into bondages, like wrong belief etc., are, in reality, non-conscious (achetana) because they are brought about by the rise of the karmic matter. If these result into karmas, then the Self cannot be the enjoyer of the fruits thereof. Because the conditions called guṇasthāna produce karmas, therefore, from the pure point of view, the Self is not the producer of karmas, and only the conditions called guṇasthāna produce karmas. ────────── जीव और प्रत्यय एक नहीं है - जह जीवस्स अणण्णुवओगो कोहो वि तह जदि अणण्णो। जीवस्साजीवस्स य एवमणण्णत्तमावण्णं॥ (3-45-113) एवमिह जो दु जीवो सो चेव दु णियमदो तहाजीवो। अयमेयत्ते दोसो पच्चयणोकम्मकम्माणं॥ (3-46-114) अह पुण अण्णो कोहो अण्णुवओगप्पगो हवदि चेदा। जह कोहो तह पच्चय कम्मं णोकम्ममवि अण्णं॥ (3-47-115) ........................ 56