समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 3 जीवो परिणामयदे पोग्गलदव्वाणि कम्मभावेण। ते सयमपरिणमंते कहं तु परिणामयदि चेदा॥ (3-50-118) अह सयमेव हि परिणमदि कम्मभावेण पोग्गलं दव्वं। जीवो परिणामयदे कम्मं कम्मत्तमितिमिच्छा॥ (3-51-119) नियमा कम्मपरिणदं कम्मं चिय होदि पोग्गलं दव्वं। तह तं णाणावरणाइपरिणदं मुणसु तच्चेव॥ (3-52-120) यह पुद्गल द्रव्य जीव में स्वयं नहीं बँधा है और कर्मभाव से स्वयं परिणमन नहीं करता है - यदि ऐसा मानो, तब तो वह अपरिणामी हो जाएगा। अथवा कार्मण वर्गणाएँ द्रव्यकर्मरूप से परिणमन नहीं करतीं - ऐसा मानो तो संसार के अभाव का प्रसंग आ जाएगा अथवा सांख्यमत का प्रसंग आ जाएगा। जीव पुद्गल द्रव्यों को कर्मभाव से परिणमन कराता है - यदि ऐसा मानो तो जीव उन्हें किस प्रकार परिणमन करा सकता है, जबकि वे पुद्गल द्रव्य स्वयं परिणमन नहीं करते; अथवा यह मानो कि पुद्गल द्रव्य स्वयं ही कर्मभाव से परिणमन करता है तो जीव कर्मरूप पुद्गल को कर्मरूप परिणमन कराता है - यह कहना मिथ्या सिद्ध होता है। इसलिए जैसे नियम से कर्मरूप (कर्त्ता के कार्यरूप से) परिणत पुद्गल द्रव्य कर्म ही है, इसी प्रकार ज्ञानावरणादि रूप परिणमित पुद्गल द्रव्य ज्ञानावरणादि ही है; ऐसा जानो।