भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 4 अज्ञानी को निर्वाण नहीं है - वदणियमाणि धरंता सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता। परमट्ठबाहिरा जे णिव्वाणं ते ण विंदंति॥ (4-9-153) व्रत और नियमों को धारण करते हुए तथा शील और तप करते हुए भी जो परमार्थ से बाह्य हैं (जिन्हें परमार्थभूत ज्ञानस्वरूप आत्मा की अनुभूति नहीं है), वे निर्वाण को प्राप्त नहीं करते। पुण्य संसार का कारण है - परमट्ठबाहिरा जे ते अण्णाणेण पुण्णमिच्छंति। संसारगमणहेदुं वि मॉक्खहेदु अयाणंता॥ (4-10-154) जो परमार्थ से बाह्य हैं (शुद्ध आत्मस्वरूप का जिन्हें अनुभव नहीं है), वे मोक्ष के हेतु को न जानते हुए अज्ञान से संसार-गमन के भी कारण पुण्य को चाहते हैं। 74