भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 4 रत्नत्रय के प्रतिबन्धक कारण - सम्मत्तपडिणिबद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहिं परिकहिदं। तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिट्ठि त्ति णादव्वो॥ (4-17-161) णाणस्स पडिणिबद्धं अण्णाणं जिणवरेहिं परिकहिदं। तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि णादव्वो॥ (4-18-162) चारित्तपडिणिबद्धं कसायमिदि जिणवरेहिं परिकहिदं। तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णादव्वो॥ (4-19-163) सम्यक्त्व का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) मिथ्यात्व है, यह जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके उदय से जीव मिथ्यादृष्टि होता है, ऐसा जानना चाहिये। ज्ञान का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) अज्ञान है, यह जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके उदय से जीव अज्ञानी होता है, ऐसा जानना चाहिये। चारित्र का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) कषाय है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके उदय से जीव चारित्ररहित होता है, ऐसा जानना चाहिये। इदि चउत्थो पुण्णपावाधियारो समत्तो 78