भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 5 ज्ञानगुण से कर्म-बन्ध - चहुविह अणेयभेयं बंधंते णाणदंसणगुणेहिं। समये समये जम्हा तेण अबंधो त्ति णाणी दु॥ (5-7-170) क्योंकि (मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग) ये चार प्रकार के द्रव्यास्त्रव ज्ञान-दर्शन गुणों के द्वारा प्रतिसमय अनेक प्रकार के कर्मों को बाँधते हैं, अतः ज्ञानी तो अबन्ध ही है। ज्ञानगुण कर्म-बन्ध का कारण क्यों है - जम्हा दु जहण्णादो णाणगुणादो पुणो वि परिणमदि। अण्णत्तं णाणगुणो तेण दु सो बंधगो भणिदो॥ (5-8-171) क्योंकि ज्ञानगुण ज्ञानगुण के जघन्य भाव (क्षायोपशमिक ज्ञान) के कारण पुनः अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् अन्य रूप से परिणमन करता है, इसी कारण वह (ज्ञानगुण का जघन्य भाव - यथाख्यात चारित्र की प्राप्ति से पूर्व तक) कर्म का बन्ध कराने वाला कहा गया है। 82