साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ || श्रीसाम्बपुराणम् ||
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गुह्यकाः सह राक्षसैः।
भूर्लोकवासिनः सर्वेऽप्यन्तरिक्षचरान् शृणु ॥६१॥
भूलोकाधिपति हैं—अग्नि, इसीलिये अग्नि को भूतपति कहते हैं। नभोलोक के अधिपति हैं—वायु, तभी वे नभस्पति कहलाते हैं। स्वर्गलोकाधिपति हैं—सूर्य, अतः उन्हें दिवस्पति कहते हैं। गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक तथा राक्षस भूलोकवासी हैं। अब अन्तरिक्षचारियों की बात सुनो॥६०-६१॥
मरुतः सप्तभिः स्कन्धैः रुद्रास्तत्रैव चाश्विनौ।
आदित्या वसवः स्वर्गे तत्रैव च गवां गणः ॥६२॥
मरुद्गण, सप्त स्कन्धगण, रुद्रगण तथा अश्विनीकुमारद्वय वहाँ अन्तरिक्ष में रहते हैं। आदित्यगण एवं वसुगण स्वर्ग में रहते हैं। वहीं गौ की भी स्थिति है॥६२॥
चतुर्थे च महर्लोके तिष्ठन्त्याकल्पवासिनः।
प्रजानां पतिभिः सर्वैः सेव्यते पञ्चमो जनः ॥६३॥
मनुः सनत्कुमाराद्या वैराजश्च तपःस्थिताः।
सत्यस्तु सप्तमो लोको ह्यापुर्मार्गगतानिमान् ॥६४॥
चतुर्थ लोक महर्लोक में आकल्पवासी निवास करते हैं। सभी प्रजागण के पतिगण जनलोक में स्थित रहते हैं। वसु, सनत्कुमारादि तथा विराट-सम्बन्धित (वैराज) सभी तपलोक में अवस्थान करते हैं। सत्य सप्तम लोक में अवस्थित है। सभी मार्गगत लोकों का यही प्राप्ति-स्थान है॥६३-६४॥
ब्रह्मलोकः समाख्यातो ह्यप्रतीघातलक्षणः।
महीतलां सहस्राणां शतादूर्ध्वं दिवाकरः ॥६५॥
यह जो सत्यलोक (ब्रह्मलोक) नाम से ख्यात है, वह विघ्नरहित स्थान है। महीतल (पृथ्वी) से शत सहस्र ऊर्ध्व में दिवाकर स्थित हैं॥६५॥
दश तानि ध्रुवं यावद् द्विगुणाद् द्विगुणोत्तरे।
दश योजनकोट्यस्तु भूमेरूर्ध्वं ध्रुवः स्मृतः ॥६६॥
ये दस लोक ध्रुव लोक-पर्यन्त द्विगुण से लेकर उत्तरोत्तर द्विगुण वर्धित होते हैं। भूमि से ऊर्ध्व में दश योजन कोटि ध्रुवलोक को कहा गया है॥६६॥
त्रयोविंशतिलक्षाणि त्रैलोक्यात् संघ उच्यते।
द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च ॥६७॥
तेईस लाख त्रैलोक्य की उच्चता कही गई है। उसका द्विगुण है—शत सहस्र योजन॥६७॥