साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २१७
ॐ उपकालाय स्वाहा ॐ—पूर्व दिशा में इन मन्त्रों से तत्तद् देवताओं की पूजा करके खाण्ड आदि पञ्च रूपकों द्वारा प्रत्येक को पात्र में बलि (उपहार) प्रदान करे।
अब दक्षिण में मूल में लिखित मन्त्रों से अघोर आदि का पूजन करना चाहिये—ॐ अघोराय स्वाहा, ॐ बटुकाय स्वाहा, ॐ ऊर्ध्वरोमाय स्वाहा, ॐ मृत्युहस्ताय स्वाहा, ॐ मेघनादाय स्वाहा, ॐ कौस्तुभाय स्वाहा, ॐ धूमकालाय स्वाहा, ॐ उग्रजिह्वाय स्वाहा, ॐ मासमूर्त्तये स्वाहा, ॐ वल्कलिने स्वाहा, ॐ दण्डिने स्वाहा, ॐ कर्मसाक्षिणे स्वाहा। इनको मत्स्य, मांस, धूलिकादि की बलि देनी चाहिये।
अब पश्चिम दिशा में सूर्यमूर्त्तियों का पूजन करे—ॐ सूर्यमूर्त्तये स्वाहा, ॐ गुहाशयाय स्वाहा, ॐ टङ्कपाणाय स्वाहा, ॐ महाबलाय स्वाहा, ॐ वायुभक्षाय स्वाहा, ॐ पञ्चमूर्त्तये स्वाहा, ॐ अग्निपाशाय स्वाहा, ॐ पशुपतये स्वाहा, ॐ महा आशाय स्वाहा, ॐ कृष्णदेहाय स्वाहा, ॐ अमोघाय स्वाहा, ॐ अच्युताय स्वाहा। इनको घृतपूर्ण क्षीरपूर्ण पात्र में बलि प्रदान करे।
उत्तर दिशा में शिखिलिङ्गी आदि का पूजन करे। यथा—ॐ शिखिलिङ्गिने स्वाहा, ॐ योगेश्वराय स्वाहा, ॐ त्रिशिखाय स्वाहा, ॐ शतक्रतवे स्वाहा, ॐ पञ्चशिखाय स्वाहा, ॐ सहस्रकिरणाय स्वाहा, ॐ सुवर्णकेतवे स्वाहा, ॐ पद्मकेतवे स्वाहा, ॐ यज्ञरूपाय स्वाहा, ॐ भुवनाधिपतये स्वाहा, ॐ पद्मनाभाय स्वाहा। इनको स्वर्ण, चाँदी तथा वस्त्र की बलि (उपहार) देनी चाहिये।
एवं यः कुरुते राजन्! पूजां शास्त्रप्रचोदिताम्।
तस्य सर्वे क्रियारम्भाः सकला प्रेत्य चेह च ॥
नान्यच्छास्त्रं समुद्दिष्टं भानोः पूजानिवेदनम्।
पुराणोक्तामिमां राजन् सर्ववेदोपबृंहिताम् ॥
महाराज! जो इस प्रकार से शास्त्रविहित पूजन करते हैं, उनकी इस लोक में तथा परलोक में सभी क्रिया सफल होती है। सूर्य के पूजादि में अन्य किसी शास्त्र का उल्लेख नहीं है। यहाँ जो कुछ बताया जा रहा है, वह वेद का संग्रहरूप तथा पुराणोक्त विधान है।
ये केचिदन्यतन्त्रज्ञाः पूजां कुर्वन्ति मोहिताः।
भक्तिश्रद्धां फलं तेषां न तु मन्त्रकृतं भवेत् ॥
जो अन्य मन्त्रों एवं तन्त्रों से मोहित (आकर्षित) होकर पूजा करता है, वह अपनी श्रद्धा तथा भक्ति का ही फल पाता है, किन्तु उसे मन्त्र का फल नहीं मिलता।
अध्येतव्यमिदंशास्त्रं सततं पापनाशनम्।
आयुरारोग्यविजयं यशः कीर्तिकरं शुभम् ॥